Rishikesh Tree Cutting Protest News: उत्तराखंड में ऋषिकेश-भानियावाला राष्ट्रीय राजमार्ग के चौड़ीकरण के नाम पर हो रहे अंधाधुंध पेड़ कटान के विरोध में स्थानीय नागरिकों, जेन-जी (Gen-Z) युवाओं और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने एनएचएआई (NHAI) कार्यालय पर एक ऐतिहासिक और विशाल प्रदर्शन किया। आंदोलनकारियों ने परियोजना के सरकारी दस्तावेजों का हवाला देते हुए खुलासा किया कि महज ‘वीआईपी मूवमेंट’ के लिए 4400 से अधिक परिपक्व पेड़ों को काटा जा रहा है और हाथियों के प्राकृतिक आवास को नष्ट किया जा रहा है। जानिए सुप्रीम कोर्ट के नीतिगत फैसलों और जनता की कड़े राजनैतिक संदेश पर आधारित इस पूरी विस्तृत ग्राउंड रिपोर्ट को।
विकास की आड़ में पर्यावरण पर प्रहार: NHAI कार्यालय का घेराव
देवभूमि उत्तराखंड में बुनियादी ढांचे के विकास और प्रकृति के संरक्षण के बीच का संतुलन एक बार फिर पूरी तरह डगमगाता हुआ नजर आ रहा है। ऋषिकेश-भानियावाला हाईवे के चौड़ीकरण की महत्वाकांक्षी परियोजना अब विवादों के केंद्र में आ चुकी है। इस परियोजना के नाम पर हजारों हरे-भरे और सदियों पुराने पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के विरोध में बुधवार को राजधानी के समीपस्थ क्षेत्र में पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों का गुस्सा ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा। आंदोलनकारियों ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के मुख्य कार्यालय पर धावा बोलते हुए एक बेहद विशाल और आक्रामक प्रदर्शन किया। इस महा-प्रदर्शन में न केवल तटीय और पर्वतीय क्षेत्रों के लोग शामिल हुए, बल्कि समाज के हर वर्ग के नागरिकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। देखते ही देखते एनएचएआई का पूरा प्रशासनिक परिसर एक बड़े आंदोलन स्थल में तब्दील हो गया। जनता के भीतर इस बात को लेकर गहरा असंतोष और रोष था कि चौड़ीकरण के नाम पर उत्तराखंड के फेफड़ों को बेरहमी से कुचला जा रहा है, जिसकी भरपाई आने वाली कई पीढ़ियां भी नहीं कर पाएंगी।
‘जेन-जी’ और युवा पीढ़ी ने संभाली आंदोलन की कमान
इस पूरे आंदोलन की सबसे अनूठी और उम्मीद जगाने वाली विशेषता यह रही कि इसमें ‘जेन-जी’ (Gen-Z) यानी आज की नई और आधुनिक युवा पीढ़ी के स्कूली व कॉलेज के बच्चों ने बहुत बड़ी संख्या में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की। अक्सर सोशल मीडिया और रील्स की दुनिया में व्यस्त रहने वाले इन युवाओं ने जब अपने जंगलों और पर्यावरण पर संकट मंडराते देखा, तो वे अपनी पढ़ाई और सुख-सुविधाओं को छोड़कर सीधे सड़क पर उतर आए। युवाओं के भीतर अपनी इस अनमोल प्राकृतिक धरोहर को खोने का जो दर्द और कड़ा गुस्सा था, उसे उन्होंने बेहद मुखर, तार्किक और प्रखर होकर अपने शब्दों में व्यक्त किया। कार्यक्रम के दौरान केवल कोरी नारेबाजी नहीं हुई, बल्कि युवाओं ने खुद कई पोस्टर, बैनर और स्केच तैयार किए थे जो पर्यावरण विनाश की भयावह तस्वीर को बयां कर रहे थे। युवा वक्ताओं ने मंच से जब बोलना शुरू किया तो उनकी आवाज में अपनी मातृभूमि के जल, जंगल और जमीन को बचाने की छटपटाहट साफ दिखाई दे रही थी। इस दौरान युवाओं और प्रदर्शनकारियों ने एनएचएआई प्रशासन के साथ-साथ सरकार की संवेदनहीन नीतियों के विरुद्ध भी आसमान गुंजा देने वाली नारेबाजी की। माहौल को और अधिक संवेदनशील और वैचारिक रूप देने के लिए युवाओं ने ढोलक और गिटार की थाप पर कई पारंपरिक और नए जनगीत भी गाए, जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया।
अनूप नौटियाल का बड़ा सवाल: जब जाम ही नहीं, तो चौड़ीकरण क्यों?
प्रदर्शन के दौरान मुख्य वक्ता के रूप में पहुंचे राज्य के प्रख्यात सामाजिक और पर्यावरण विशेषज्ञ अनूप नौटियाल ने इस पूरी हाईवे चौड़ीकरण परियोजना के औचित्य और उसकी तकनीकी आवश्यकता पर ही बहुत गंभीर सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने आधिकारिक आंकड़ों और जमीनी हकीकत को जनता के सामने रखते हुए कहा कि इस हाईवे को और अधिक चौड़ा करने की कोई भी वास्तविक या व्यावहारिक आवश्यकता वर्तमान समय में बिल्कुल भी नहीं है। इसी क्रम में ऋषिकेश, डोइवाला और भानियावाला से आए कई नियमित यात्रियों और प्रदर्शनकारियों ने भी इस बात को पूरी मजबूती और प्रमाण के साथ उठाया कि वे अपने दैनिक कार्यों, नौकरी और व्यवसाय के सिलसिले में अक्सर देहरादून से ऋषिकेश के बीच इस मार्ग पर लगातार यात्रा करते हैं। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि आज तक किसी भी सामान्य या आपातकालीन दिन में उन्हें इस रोड पर कभी भी कोई गंभीर ट्रैफिक जाम की स्थिति देखने को नहीं मिली है। यह सड़क पहले से ही पर्याप्त रूप से चौड़ी और सुगम है। ऐसे में बिना किसी ठोस कारण और वैज्ञानिक अध्ययन के इतनी भारी संख्या में जीवन देने वाले परिपक्व पेड़ों को काटना पूरी तरह से तर्कहीन, अविवेकपूर्ण और पर्यावरण के खिलाफ एक बड़ा अपराध है।
चौंकाने वाला खुलासा: महज ‘वीआईपी मूवमेंट’ के लिए कट रहे हैं 4400 पेड़
आंदोलन के दौरान मंच से बोलते हुए मयंक दत्ता सहित अन्य शोधकर्ताओं और वक्ताओं ने एक ऐसा चौंकाने वाला और परेशान करने वाला खुलासा किया, जिसे सुनकर वहां मौजूद हर नागरिक सन्न रह गया। मयंक दत्ता ने बताया कि जब उनकी टीम ने सूचना के अधिकार और इस परियोजना से जुड़े विभिन्न उच्च स्तरीय आधिकारिक दस्तावेजों, पर्यावरण स्वीकृतियों (क्लियरेंस परमिशन) की बारीकी से छानबीन की, तो सरकारी फाइलों के भीतर एक बेहद कड़वा सच सामने आया। दस्तावेजों के अनुसार, इस सड़क को चार लेन या अधिक चौड़ा बनाने के लिए सरकार द्वारा जो मुख्य जस्टिफिकेशन (प्रशासनिक औचित्य) दिया गया है, उसमें आम जनता की सुविधा या एक्सीडेंट रोकना नहीं, बल्कि ‘वीआईपी मूवमेंट’ (VIP Movement) की सुगमता को प्राथमिक आधार बनाया गया है। वक्ताओं ने इस बात पर बेहद गहरा आक्रोश और तीखी आपत्ति जताई कि महज कुछ गिने-चुने नेताओं, मंत्रियों और वीआईपी लोगों के समय को दो-चार मिनट बचाने और उनके लग्जरी आवागमन को आरामदायक बनाने के लिए इस क्षेत्र के 4400 से अधिक पूरी तरह से परिपक्व, फलदार और छायादार पेड़ों की क्रूरतापूर्वक बलि दी जा रही है। उन्होंने कहा कि यह लोकतंत्र का मज़ाक है जहां आम जनता के पर्यावरण को वीआईपी संस्कृति की भेंट चढ़ाया जा रहा है।
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हाथियों का घर उजाड़कर बनाई जा रही है कंक्रीट की सड़क
पर्यावरणविदों ने इस बात पर भी विशेष रूप से प्रकाश डाला कि भानियावाला से ऋषिकेश के बीच का यह पूरा वन्य क्षेत्र और जंगल हाथियों का सदियों पुराना प्राकृतिक आवास (Natural Habitat) है। यह राजाजी नेशनल पार्क के बफर जोन और हाथियों के आवागमन के पारंपरिक रास्तों से सीधे जुड़ा हुआ है। स्थानीय ग्रामीणों और राहगीरों द्वारा इस मुख्य रास्ते पर अक्सर शाम और रात के समय हाथियों के झुंड को पार करते हुए या सड़क किनारे शांति से विचरते हुए देखा जाता रहा है। प्रदर्शनकारियों में इस बात को लेकर भारी गुस्सा और दुख था कि तथाकथित आधुनिक विकास के नाम पर बेजुबान हाथियों का यह सुरक्षित घर उजाड़कर यहाँ कंक्रीट का जाल क्यों बिछाया जा रहा है। वक्ताओं ने कहा कि केवल वीआईपी मूवमेंट की खातिर हाथियों के इस ऐतिहासिक गढ़ और उनके कॉरिडोर को नष्ट करना पूरी तरह से संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। यदि हाथियों के रास्ते रोके गए, तो आने वाले समय में मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) की घटनाएं तेजी से बढ़ेंगी, जिससे आस-पास के गांवों के इंसानों की जान को भी भारी खतरा पैदा हो जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के ‘मधुमलाई जजमेंट’ की अनदेखी पर हिमांशु अरोड़ा के तीखे बाण
आंदोलन को तकनीकी और कानूनी रूप से सुदृढ़ करते हुए प्रमुख पर्यावरण कार्यकर्ता हिमांशु अरोड़ा ने एनएचएआई और वन विभाग के अधिकारियों को देश की सर्वोच्च अदालत के कड़े नियमों की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि देश के माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने साल 2020 के ऐतिहासिक ‘मधुमलाई जजमेंट’ में साफ तौर पर यह व्यवस्था दी है कि देश के भीतर हाथियों के जितने भी कॉरिडोर या प्राकृतिक रास्ते हैं, उनका संरक्षण करना सरकार और प्रशासन की संवैधानिक जिम्मेदारी है। अदालत ने ऐसे क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के बड़े और विनाशकारी निर्माण कार्यों को रोकने के लिए बेहद कड़े और प्रभावी निर्देश दिए हैं। इसके बावजूद उत्तराखंड का प्रशासनिक अमला इन दिशा-निर्देशों की खुलेआम अनदेखी कर रहा है। हिमांशु अरोड़ा ने आगे एक और बड़ा कानूनी बिंदु उठाते हुए बताया कि इस पूरे मामले को लेकर एक जनहित याचिका (अनिता कंडपाल मामला) अभी भी माननीय उच्च न्यायालय/न्यायालय में पूरी तरह से लंबित है, जिस पर अंतिम फैसला आना बाकी है। कोर्ट में मामला विचाराधीन होने के बावजूद प्रशासन और ठेकेदारों द्वारा रातों-रात गुपचुप तरीके से पेड़ काटने की जो इतनी जल्दबाजी दिखाई जा रही है, वह कानूनी और नैतिक दोनों ही पैमानों पर पूरी तरह से गलत, असंवैधानिक और निंदनीय है।
राजनीतिक दलों को कड़ा संदेश: “जल, जंगल, जमीन के दुश्मनों को वोट नहीं”
इस विशाल जन-आंदोलन के मंच से प्रदर्शनकारियों और वक्ताओं ने केवल प्रशासनिक अधिकारियों को ही नहीं घेरा, बल्कि राज्य और देश की राजनैतिक पार्टियों को भी स्पष्ट और कड़े शब्दों में एक बहुत बड़ा और निर्णायक राजनैतिक संदेश दे दिया है। आंदोलनकारियों ने पूरी एकजुटता के साथ यह संकल्प लेते हुए कहा, “हम आने वाले समय में किसी भी ऐसी राजनैतिक पार्टी या नेता को अपना बहुमूल्य वोट कतई नहीं देंगे, जो हमारे जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण के अस्तित्व के खिलाफ जाकर फैसले लेते हैं। हमारे लिए हमारी आने वाली पीढ़ियों की सांसें और यह प्रकृति सबसे पहले है।” युवाओं ने हुंकार भरते हुए कहा कि आने वाले चुनावों में वे पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली और जंगलों को काटने का समर्थन करने वाली ऐसी सभी पार्टियों का, चाहे वो सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, बिना किसी डर के सड़क पर उतरकर भरपूर विरोध करेंगे और जनता के बीच जाकर उनकी पोल खोलेंगे। अब उत्तराखंड का चुनाव केवल वादों पर नहीं, बल्कि पर्यावरण के असली मुद्दों पर लड़ा जाएगा।
जनता के भारी गुस्से के आगे झुके NHAI के डायरेक्टर सौरभ सिंह, मांगे दस्तावेज
एनएचएआई कार्यालय के बाहर कई घंटों तक चले इस उग्र और जोरदार प्रदर्शन, नारेबाजी तथा जनगीतों की गूंज ने आखिरकार भीतर बंद अधिकारियों के कान खोल दिए। प्रदर्शनकारियों के अडिग रुख और भारी भीड़ को देखते हुए पुलिस और प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए, जिसके बाद एनएचएआई के क्षेत्रीय डायरेक्टर सौरभ सिंह को मजबूरन अपने सुरक्षित केबिन से बाहर निकलकर प्रदर्शनकारियों के बीच आना पड़ा। जैसे ही डायरेक्टर बाहर आए, उन्हें स्थानीय नागरिकों और उग्र युवाओं के भारी आक्रोश, तीखे सवालों और विरोध का सीधे तौर पर सामना करना पड़ा। लोगों ने उनसे सीधे पूछा कि किस कानून के तहत कोर्ट में मामला लंबित होने के बाद भी पेड़ काटे जा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने बेहद अनुशासित लेकिन कड़े लहजे में एक आधिकारिक प्रार्थना पत्र (मेमोरेंडम) डायरेक्टर सौरभ सिंह को सौंपा। इस पत्र के माध्यम से मांग की गई कि इस परियोजना के तहत अब तक जितने भी पेड़ काटे गए हैं या काटे जाने वाले हैं, उससे जुड़ी पर्यावरण मंत्रालय और वन विभाग की सभी स्वीकृतियों (Approvals) की पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए। आंदोलनकारियों ने अल्टीमेटम दिया कि इससे संबंधित सभी आधिकारिक और तकनीकी दस्तावेज तुरंत जनता को प्रदान किए जाएं, जब तक दस्तावेजों की पारदर्शिता सामने नहीं आती, तब तक धरातल पर एक भी पेड़ को छूने नहीं दिया जाएगा।









