Supreme court Judgement on Harish Rana Passive Euthanasia Allowed 13 साल का लंबा संघर्ष: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद निवासी हरीश राणा की कहानी केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि एक परिवार के अटूट धैर्य और पीड़ा की दास्तां है। साल 2013 में चंडीगढ़ में बी.टेक की पढ़ाई के दौरान एक पीजी (PG) की चौथी मंजिल से गिरने के कारण हरीश के सिर में गंभीर चोट आई थी। तब से वे ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (PVS) यानी कोमा जैसी स्थिति में थे। 13 साल तक बिस्तर पर अचेत रहने और 100% दिव्यांगता झेलने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने अंततः उन्हें “गरिमा के साथ मरने” की अनुमति दे दी है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: ‘टू बी ओर नॉट टू बी’
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इस मामले में भावुक और कानूनी रूप से सुदृढ़ फैसला सुनाया। जस्टिस पारदीवाला ने शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक ‘हैमलेट’ के उद्धरण “To be or not to be” (होना या न होना) का जिक्र करते हुए कहा कि आज यह साहित्यिक पंक्ति ‘मरने के अधिकार’ की न्यायिक व्याख्या के लिए उपयोग की जा रही है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी मरीज के ठीक होने की कोई संभावना न हो और वह केवल मशीनों या कृत्रिम सहायता (जैसे भोजन की नली) के सहारे जीवित हो, तो उसे अनिश्चित काल तक पीड़ा में रखना उसके मानवीय सम्मान के खिलाफ है।
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मुख्य कानूनी बिंदु और निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें कहीं:
- पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति: कोर्ट ने हरीश राणा को ‘पैसिव यूथेनेशिया’ देने की गुहार मंजूर कर ली। भारत में ‘एक्टिव यूथेनेशिया’ (जहर का इंजेक्शन देना) प्रतिबंधित है, लेकिन ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (इलाज या लाइफ सपोर्ट हटाना) कानूनी रूप से मान्य है।
- AIIMS को निर्देश: कोर्ट ने निर्देश दिया कि हरीश को दिल्ली के AIIMS (एम्स) के ‘पैलिएटिव केयर वार्ड’ में भर्ती किया जाए। वहां डॉक्टरों की देखरेख में धीरे-धीरे उनका चिकित्सकीय उपचार और भोजन की नली (PEG Tube) हटाई जाएगी।
- गरिमापूर्ण विदाई: कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जिस तरह एक व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने का अधिकार है, उसी तरह उसे गरिमा के साथ मरने का भी अधिकार (Right to Die with Dignity) है। इस प्रक्रिया के दौरान उन्हें कोई दर्द न हो, इसका पूरा ध्यान रखा जाएगा।
- मेडिकल बोर्ड की भूमिका: कोर्ट ने एम्स की उस मेडिकल रिपोर्ट को आधार बनाया जिसमें कहा गया था कि हरीश के मस्तिष्क की नसें सूख चुकी हैं और उनके सुधार की “शून्य संभावना” है।
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माता-पिता का दर्द और न्याय
सुनवाई के दौरान हरीश के पिता अशोक राणा की बातों ने कोर्ट को भी भावुक कर दिया। उन्होंने कहा, “अपने बच्चे को हर दिन तिल-तिल मरते देखना एक माता-पिता के लिए सबसे बड़ा दंड है।” परिवार ने इलाज के लिए अपना घर तक बेच दिया था। कोर्ट ने राणा परिवार के समर्पण की सराहना की और कहा कि यह फैसला हार मानना नहीं, बल्कि बेटे के प्रति उनकी करुणा और प्रेम का प्रतीक है।
हरीश राणा का मामला ‘कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018)’ के फैसले के बाद एक मील का पत्थर है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि कानून केवल सांसें चलाने का नाम नहीं है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता और मानवीय गरिमा को सर्वोपरि रखने का माध्यम है।
गौर हो कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च, 2026 को गाजियाबाद के हरीश राणा के मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह भारत के न्यायिक इतिहास में संभवतः पहला ऐसा मामला है जहां शीर्ष अदालत ने किसी व्यक्ति को ‘पैसिव यूथेनेशिया‘ (इच्छा मृत्यु) की स्पष्ट मंजूरी दी है। ये मामले अपने आप में पहला है, जिसमें कोर्ट के दखल के बाद किसी व्यक्ति को इच्छा मृत्यु की अनुमति दी गई है।










