Hemkund Sahib Yatra Closing News: सफेद बर्फ की चादर ओढ़ने को बेताब हिमालय की ऊंची चोटियों, शीतल पवन के थपेड़ों और वाहेगुरु के जयकारों के बीच उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित विश्व के सबसे ऊंचे गुरुद्वारों में से एक श्री हेमकुंड साहिब के कपाट शीतकाल के लिए परंपरागत मर्यादा और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ बंद कर दिए गए हैं। बीते एक सौ चालीस दिनों तक चली इस कठिन एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण यात्रा में देश और दुनिया भर से उमड़े करीब तीन लाख चौरासी हजार श्रद्धालुओं ने मत्था टेककर पुण्य अर्जित किया। इस वर्ष के यात्रा सत्र का समापन न केवल आस्था के लिहाज़ से ऐतिहासिक रहा, बल्कि सरहद पार से आए चालीस पाकिस्तानी सिख श्रद्धालुओं की मौजूदगी ने इस अंतिम अरदास को भाईचारे और अखंड विश्वास का एक अनूठा प्रतीक बना दिया। कपाट बंद होने के साथ ही पूरा हेमकुंड परिसर अब अगले छह महीनों के लिए घने हिमपात और सन्नाटे की गोद में समा गया है।

समुद्र तल से लगभग पंद्रह हजार दो सौ पच्चीस फीट की ऊंचाई पर स्थित इस पावन धाम में सुबह से ही वातावरण में एक अजीब सी विदाई की भावुकता और आध्यात्मिक तेज घुला हुआ था। हिमालय की बर्फीली हवाएं शरीर को कंपा रही थीं, मगर श्रद्धालुओं के मन में जल रही श्रद्धा की लौ के आगे मौसम की यह सख्ती पूरी तरह बेअसर साबित हो रही थी। सुबह की शुरुआत गुरुवाणी के मधुर गायन और शब्द कीर्तन से हुई, जिसने वहां मौजूद हर एक श्रद्धालु के दिल को छू लिया। रागी जत्थों द्वारा गाए गए शबदों ने वातावरण में ऐसी रूहानियत भर दी कि चारों ओर केवल और केवल भक्ति का साम्राज्य नजर आ रहा था। इसके बाद सुखमणि साहिब का पाठ संपन्न हुआ और फिर इस वर्ष के यात्रा सत्र की अंतिम अरदास की गई।
अंतिम अरदास के दौरान उपस्थित जनसमूह की आंखें नम थीं और हाथ गुरु के चरणों में जुड़े हुए थे। इस पावन अवसर पर गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के पदाधिकारियों, स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों, सेना और आईटीबीपी के जवानों के साथ-साथ हजारों की संख्या में देशी-विदेशी संगतों ने भाग लिया। ठीक दोपहर में परंपरागत सैन्य एवं धार्मिक सम्मान के साथ पंच प्यारों की अगुवाई में पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब को दरबार हॉल से पूरे आदर और सत्कार के साथ सचखंड साहिब में ले जाया गया। वहां हुकमनामे के पाठ के उपरांत विधिवत रूप से गुरु ग्रंथ साहिब को विश्राम दिया गया और इसके साथ ही कपाट बंद करने की प्रक्रिया पूरी की गई। इस पल के साक्षी बने हर श्रद्धालु के मुख से ‘बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ का उद्घोष गूंज उठा, जिससे सप्तश्रृंग पर्वत की ऊंची-ऊंची चोटियां देर तक प्रतिध्वनित होती रहीं।
इस वर्ष की कपाट बंदी का सबसे भावुक और मानवीय पहलू था पाकिस्तान से आए चालीस सिख श्रद्धालुओं का जत्था। भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं से परे जब यह जत्था अंतिम अरदास में शामिल हुआ, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें भर आईं। इन श्रद्धालुओं के लिए हेमकुंड साहिब तक पहुंचना केवल एक तीर्थ यात्रा नहीं, बल्कि जीवन भर के संजोए हुए सपने का साकार होना था। सरहद के उस पार से आए इन श्रद्धालुओं ने जब पवित्र सरोवर के किनारे खड़े होकर माथा टेका और अरदास में हाथ उठाए, तो यह दृश्य स्पष्ट कर रहा था कि सच्ची आस्था और गुरु के प्रति समर्पण के आगे भौगोलिक सीमाएं, पासपोर्ट और वीजा के कागजात बहुत छोटे पड़ जाते हैं। इन श्रद्धालुओं ने बताया कि वे वर्षों से गुरु गोविंद सिंह जी की इस तपोभूमि के दर्शन की तमन्ना दिल में संजोए हुए थे और आज जब उनका यह स्वप्न साकार हुआ, तो उनके पास ईश्वर का आभार जताने के लिए शब्द कम पड़ गए।
इस वर्ष के यात्रा सत्र की सफलता कई मायनों में अभूतपूर्व मानी जा रही है। एक सौ चालीस दिनों के पूरे कार्यकाल में लगभग तीन लाख चौरासी हजार श्रद्धालुओं का यहां पहुंचना अपने आप में एक बड़ा कीर्तिमान है। हिमालय का यह दुर्गम रास्ता कभी भूस्खलन, कभी अचानक होने वाली बारिश और कभी ऑक्सीजन की कमी के चलते बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है। इसके बावजूद बुजुर्गों, युवाओं, महिलाओं और बच्चों का लगातार यहां पहुंचना यह साबित करता है कि जब मन में भक्ति का संकल्प दृढ़ हो, तो रास्ते की कोई भी रुकावट कदम नहीं रोक सकती। गोविंदघाट से घांघरिया और फिर घांघरिया से हेमकुंड साहिब तक की छह किलोमीटर की सीधी और पथरीली चढ़ाई सांसों की परीक्षा लेती है, मगर ‘सतनाम वाहेगुरु’ का निरंतर जाप यात्रियों को हर कदम पर नई शक्ति प्रदान करता रहता है।
हेमकुंड साहिब का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व सिख पंथ में अत्यंत पावन माना जाता है। दशम पातशाह श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने अपनी आत्मकथा ‘बचित्तर नाटक’ में इस स्थान का उल्लेख करते हुए बताया था कि पूर्व जन्म में उन्होंने इसी पर्वत पर दुष्ट दमन के रूप में घोर तपस्या की थी। यह वही पावन भूमि है जो सात विशाल बर्फानी पहाड़ों यानी सप्तश्रृंग से घिरी हुई है। इस पर्वतमाला के बीच स्थित स्वच्छ, पारदर्शी और नीले जल का सरोवर मन के सारे विकारों को धो देने वाला माना जाता है। किंवदंतियों के अनुसार, इसी सरोवर के तट पर लोकपाल लक्ष्मण जी ने भी तपस्या की थी, जिसके चलते यहां एक प्राचीन लक्ष्मण मंदिर भी स्थापित है। कपाट बंद होने के अवसर पर लक्ष्मण मंदिर के कपाट भी विधिपूर्वक शीतकाल के लिए बंद किए गए।
कपाट बंद होने की प्रक्रिया केवल एक धार्मिक रस्म नहीं है, बल्कि यह हिमालय के मौसम चक्र के साथ सामंजस्य बिठाने की एक अनिवार्य व्यवस्था भी है। अक्टूबर के महीने से ही इस ऊंचाई पर तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है। रात के समय पानी की पाइपलाइनें जम जाती हैं और हवा में नमी की जगह तीखी ठंडक ले लेती है। नवंबर आते-आते यहां भारी हिमपात शुरू हो जाता है, जो पूरी घाटी को कई-कई फीट बर्फ के नीचे दबा देता है। ऐसे में गुरुद्वारे का सामान्य संचालन संभव नहीं होता। कपाट बंद होने के तुरंत बाद गुरुद्वारा ट्रस्ट के सेवादार, विद्युत कर्मी, पेयजल व्यवस्था संभालने वाले दल और सुरक्षा बल नीचे के पड़ावों यानी घांघरिया और गोविंदघाट की ओर लौटना शुरू कर देते हैं। अब यह समूचा इलाका तब तक प्रकृति के एकांत में रहेगा जब तक कि अगले वर्ष मई के महीने में बर्फ काटकर दोबारा रास्ता नहीं बना लिया जाता।

इस पूरे यात्रा सत्र को निर्विघ्न और सुरक्षित संपन्न कराने में स्थानीय प्रशासन, उत्तराखंड पुलिस, राज्य आपदा प्रतिपादन बल यानी एसडीआरएफ, और सेना के जवानों की भूमिका अत्यंत सराहनीय रही। यात्रा मार्ग पर चिकित्सा शिविरों की व्यवस्था, ऑक्सीजन सिलेंडर की उपलब्धता और संवेदनशील स्थानों पर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती ने हजारों श्रद्धालुओं को विषम परिस्थितियों में भी सुरक्षित दर्शन कराए। कई बार अचानक मौसम खराब होने और तेज बारिश के कारण रास्तों पर बोल्डर गिरने की घटनाएं हुईं, मगर प्रशासन और गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के तालमेल ने कुछ ही घंटों में मार्ग को सुचारू कर मिसाल पेश की।
कपाट बंद होने के बाद अब गोविंदघाट और जोशीमठ में भी चहल-पहल धीरे-धीरे शांत होने लगी है। जिन पड़ावों पर पिछले साढ़े चार महीनों से तीर्थयात्रियों के जत्थे, खच्चर वाले, स्थानीय दुकानदार और सेवादार दिन-रात सक्रिय थे, वहां अब शीतकालीन विश्राम का माहौल बनने लगा है। स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी यह यात्रा एक जीवन रेखा की तरह काम करती है, जिससे हजारों परिवारों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलता है।
अंतिम अरदास की समाप्ति के बाद जब संगतें गुरु का लंगर छककर भारी मन से नीचे की ओर लौटने लगीं, तो हर चेहरे पर एक तृप्ति और संतोष का भाव साफ झलक रहा था। हिमालय के इस पावन आंचल से विदा लेते हुए श्रद्धालुओं के मन में केवल एक ही प्रार्थना थी कि वाहेगुरु उन्हें अगले वर्ष फिर से इस पवित्र धरती पर शीश नवाने का सौभाग्य बख्शें। हेमकुंड साहिब के कपाट भले ही अब छह महीनों के लिए बंद हो चुके हैं, मगर वहां से लेकर लौटी शांति, आध्यात्मिक तृप्ति और सौहार्द की पावन स्मृतियां देश और दुनिया के कोने-कोने में बसे लाखों श्रद्धालुओं के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगी।
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