Dehradun News: लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी सरकार और उसके प्रशासनिक तंत्र की वास्तविक सफलता केवल फाइलों में बंद योजनाओं या बजट आवंटन के आंकड़ों से तय नहीं होती। योजनाओं की सार्थकता इस बात पर निर्भर करती है कि वे समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के जीवन में क्या सकारात्मक बदलाव ला रही हैं और क्या आम नागरिक स्वयं को उन व्यवस्थाओं का सक्रिय भागीदार मान रहा है। जब तक शासन की नीतियां केवल शासक और शासित के औपचारिक ढांचे में बंधी रहती हैं, तब तक कोई भी राष्ट्रव्यापी या राज्यव्यापी परिवर्तन स्थायी रूप नहीं ले पाता। इसके विपरीत जब प्रशासन स्वयं को समाज के एक हिस्से के रूप में प्रस्तुत करता है और आम जनमानस अपने नागरिक दायित्वों को समझकर आगे आता है, तो एक शांत सामाजिक क्रांति का सूत्रपात होता है।

उत्तराखंड की पावन भूमि पर आगामी 15 सितंबर से 18 अक्टूबर 2026 तक आयोजित होने वाला तैंतीस दिवसीय ‘सेवा संकल्प अभियान’ इसी चेतना को धरातल पर साकार करने का एक ऐतिहासिक प्रयास बनकर उभर रहा है। देहरादून के कलक्ट्रेट सभागार में जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान की अध्यक्षता में संपन्न हुई उच्चस्तरीय बैठक ने इस महा-अभियान की स्पष्ट, व्यावहारिक और संवेदनशील रूपरेखा प्रस्तुत कर दी है। सभी रेखीय विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ हुए इस गंभीर विचार-विमर्श में एक बात खुलकर सामने आई कि यह अभियान केवल कुछ औपचारिक कार्यक्रमों, फीता काटने की रस्मों या तस्वीरों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका मूल दर्शन सेवा, स्वच्छता, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, युवा ऊर्जा और राष्ट्र निर्माण को एक सूत्र में पिरोकर हर नागरिक के दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना है।
सवा महीने से अधिक समय तक चलने वाले इस उत्सव में सरकारी अमले की कार्यप्रणाली का मुख्य लक्ष्य जनता के द्वार तक पहुंचकर उनकी समस्याओं का समाधान करना और उनमें आत्मगौरव का भाव जगाना होगा। किसी भी जन-आंदोलन की ताकत उसकी स्पष्ट प्राथमिकताओं और भावनात्मक जुड़ाव में निहित होती है। सेवा संकल्प अभियान को समाज के हर वर्ग तक सहजता से पहुंचाने के लिए कई अनूठी और विचारोत्तेजक थीमों के तहत विभाजित किया गया है। इनमें ‘भारत 2047’, ‘सेवा और सपना’, ‘नमो 25 गाथा’, ‘आंगन का उत्सव’, ‘25 साल-25 कहानियां’ और ‘जन कल्याण संवाद’ जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं। इन थीमों का चयन बेहद मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक सोच को दर्शाता है। जहां ‘भारत 2047’ राज्य की युवा पीढ़ी और स्कूली बच्चों को यह सोचने के लिए प्रेरित करेगा कि जब हमारा देश अपनी स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा तब उनका योगदान कैसा होगा, वहीं ‘सेवा और सपना’ समाज के उन मूक साधकों के सपनों को मंच देगा जो बिना किसी प्रचार के अपने स्तर पर समाज सुधार में लगे हैं। शिक्षण संस्थानों में ‘विकसित भारत’ की थीम पर निबंध, वाद-विवाद और चित्रकला प्रतियोगिताओं का आयोजन केवल एक शैक्षणिक औपचारिकता नहीं होगा। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों के कोमल मन में यह भाव बैठाना है कि देश का विकास केवल भव्य इमारतों और सड़कों का निर्माण नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों, सामाजिक समरसता और ज्ञान आधारित समाज का निर्माण है।
वहीं दूसरी ओर, ‘नमो 25 गाथा’ के अंतर्गत आयोजित होने वाले बहुभाषी नाटकों के मंचन से संस्कृति और राष्ट्रभक्ति के प्रेरक प्रसंग आम जनता के दिलों तक सीधे पहुंचेंगे। जब रंगमंच के सशक्त माध्यम से संघर्ष, संकल्प और सिद्धि की कहानियां स्थानीय बोलियों और सहज भाषा में प्रस्तुत की जाती हैं, तो उनका प्रभाव किसी भी व्याख्यान से कहीं अधिक गहरा और अमिट होता है। इस अभियान का सबसे बुनियादी और प्रत्यक्ष प्रभाव स्वच्छता के क्षेत्र में देखने को मिलेगा। अक्सर देखा गया है कि स्वच्छता को केवल सफाई कर्मचारियों की आधिकारिक जिम्मेदारी मान लिया जाता है, जिसके कारण सार्वजनिक स्थल कुछ ही समय में फिर से गंदगी का शिकार हो जाते हैं। सेवा संकल्प अभियान के प्रथम चरण में इस मानसिकता को जड़ से बदलने का लक्ष्य रखा गया है।

सभी सरकारी कार्यालयों, प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों, विश्वविद्यालयों, नगर निकायों, सामुदायिक व जिला अस्पतालों, धार्मिक स्थलों और दूरस्थ ग्राम पंचायतों में एक साथ सघन स्वच्छता महा-अभियान छेड़ा जाएगा। सरकारी कार्यालयों के भीतर वर्षों से लंबित पुरानी रद्दी, अनुपयोगी फाइलों और कबाड़ का वैज्ञानिक निस्तारण किया जाएगा, ताकि कार्यस्थल का वातावरण सकारात्मक और ऊर्जावान बन सके। अस्पतालों में मरीजों और तीमारदारों के लिए स्वच्छता और संक्रमण-मुक्त वातावरण तैयार करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तराखंड जैसे तीर्थ-प्रधान राज्य में धार्मिक स्थलों, नदी घाटों और प्राचीन जलस्रोतों (धारों और नौलों) की सफाई को इसमें सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।
इसके साथ ही पर्यावरण के प्रति जन-चेतना जागृत करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन और उनके सेवा-आधारित कृतित्व से जुड़ी पुस्तकों का वितरण भी सुनिश्चित किया जाएगा, ताकि लोग सादगी और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली की प्रेरणा ले सकें। किसी भी राज्य का भविष्य उसकी युवा ऊर्जा की दिशा से निर्धारित होता है। उत्तराखंड का युवा साहसी, कर्मठ और प्रतिभासंपन्न है, लेकिन कई बार स्थानीय स्तर पर उचित मंच न मिलने के कारण वह अपनी क्षमताओं का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाता। सेवा संकल्प अभियान ने युवाओं को सिर्फ दर्शक न बनाकर उन्हें इस पूरी योजना का मुख्य कर्ताधर्ता बनाया है। युवाओं के भीतर छिपी वैज्ञानिक सोच और तकनीकी समझ को सामने लाने के लिए विशेष हैकाथॉन और इनोवेशन चैलेंज आयोजित किए जाएंगे।
इन प्रतियोगिताओं में स्थानीय समस्याओं—जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में अपशिष्ट प्रबंधन, मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम, जल संरक्षण की आधुनिक तकनीक और स्थानीय उत्पादों की पैकेजिंग व ब्रांडिंग—के व्यावहारिक समाधान खोजने का जिम्मा युवाओं को सौंपा जाएगा। इसके साथ ही, आज के डिजिटल युग में युवाओं की दृश्य-श्रव्य अभिव्यक्ति को सम्मान देने के लिए शॉर्ट फिल्म निर्माण जैसी रचनात्मक प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी। इन फिल्मों का मुख्य विषय उत्तराखंड के बदलते परिदृश्य, ग्रामीण जीवन के संघर्ष, स्थानीय नायकों की गाथाएं और सेवा के प्रेरक प्रसंग होंगे। युवा कल्याण और खेल विभाग की देखरेख में 7 अक्टूबर को आयोजित होने वाला ‘सेवा ज्योति यात्रा दिवस’ इस अभियान का एक स्वर्णिम अध्याय सिद्ध होगा।

इस दिन निकाली जाने वाली भव्य रिले मैराथन में केवल खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि समाज के हर तबके के नागरिक—चाहे वे पूर्व सैनिक हों, गृहणियां हों, व्यापारी हों या बुजुर्ग—हाथों में एकता और सेवा की ज्योति थामकर दौड़ेंगे। यह मैराथन शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाने के साथ-साथ समाज को एकसूत्र में बांधने का सशक्त माध्यम बनेगी। उत्तराखंड ने अपनी स्थापना के बाद से अब तक विकास और बदलाव की एक लंबी और चुनौतीपूर्ण यात्रा तय की है। सेवा संकल्प अभियान इस विकास यात्रा को केवल आंकड़ों तक सीमित न रखकर जन-उत्सव का रूप देगा। इसके तहत 17 सितंबर को ‘रंगोली राष्ट्र’ का अद्भुत कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। राज्य के प्रमुख चौराहों, ऐतिहासिक परिसरों और सार्वजनिक स्थानों पर विशाल और कलात्मक रंगोलियों का निर्माण होगा। इन रंगोलियों में जहां भारत की बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाई देगी, वहीं उत्तराखंड के पारंपरिक ऐपण कला के जरिए राज्य के सामाजिक विकास और प्राकृतिक सौंदर्य को जीवंत किया जाएगा। यह कार्यक्रम हमारी लोककलाओं को सम्मान देने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का अनुपम माध्यम बनेगा। इसके उपरांत, 7 से 17 अक्टूबर की अवधि में ‘प्रगति के 25 स्तंभ’ शीर्षक से एक अत्यंत भव्य और आधुनिक प्रस्तुतीकरण किया जाएगा।
इस दौरान अत्याधुनिक प्रोजेक्शन मैपिंग, लाइट एंड साउंड शो और समृद्ध सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से उन ऐतिहासिक परियोजनाओं की गाथा जनता के सामने लाई जाएगी जिन्होंने उत्तराखंड की तस्वीर और तकदीर बदलने का काम किया है। वर्ष 2013 की भीषण प्राकृतिक आपदा के बाद श्री केदारनाथ और श्री बदरीनाथ धाम का दिव्य और भव्य पुनर्निर्माण किस प्रकार संभव हुआ, मानसखंड मंदिर माला मिशन के माध्यम से कुमाऊं के उपेक्षित तीर्थस्थलों को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर कैसे उभारा जा रहा है, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग जैसी दुर्गम और असंभव प्रतीत होने वाली रेल परियोजना ने किस प्रकार पहाड़ों का सीना चीरकर नया इतिहास रचा है, दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे ने कैसे दोनों क्षेत्रों की दूरियों को मिटाया है, और लखवाड़ तथा जमरानी बांध जैसी बहुउद्देशीय परियोजनाएं किस तरह आने वाली पीढ़ियों के लिए जल और ऊर्जा की सुरक्षा सुनिश्चित कर रही हैं—इन सभी विषयों को तकनीकी भव्यता और भावनात्मक गहराई के साथ प्रस्तुत किया जाएगा। इससे नागरिकों में, विशेषकर नई पीढ़ी में, अपने राज्य की प्रगति के प्रति स्वाभिमान और विश्वास का नया संचार होगा।
इस अभियान की सबसे मानवीय, व्यावहारिक और अनुकरणीय पहलों में से एक ‘प्रोजेक्ट 25-25-25’ की परिकल्पना है। यह कोई सरकारी औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रत्येक जागरूक नागरिक के अंतःकरण को छूने वाला एक आत्मिक आह्वान है। इसके तहत राज्य के प्रत्येक नागरिक से यह विनम्र अपील की जाएगी कि वह प्रतिदिन अपने व्यस्त समय में से कम से कम पच्चीस मिनट अपने देश, अपने समाज और अपने परिवेश के नाम समर्पित करे। इन पच्चीस मिनटों में कोई भी व्यक्ति अपने घर के आसपास सफाई कर सकता है, एक पौधा रोपकर उसकी देखभाल की जिम्मेदारी ले सकता है, किसी अशिक्षित या बुजुर्ग व्यक्ति को डिजिटल लेनदेन या मोबाइल के सदुपयोग की साक्षरता दे सकता है, अथवा किसी असहाय व्यक्ति की छोटी सी मदद कर सकता है।
जब लाखों लोग रोज पच्चीस मिनट का यह निःस्वार्थ योगदान देंगे, तो उसका सम्मिलित प्रभाव किसी भी बड़े सरकारी बजट से कहीं अधिक व्यापक और स्थायी होगा। इसके साथ ही, समाज के कमजोर, वंचित और उपेक्षित वर्गों के आंसू पोंछना ही सच्ची सेवा है, और यह अभियान इस बात को भलीभांति रेखांकित करता है। अभियान के दौरान दूरदराज के क्षेत्रों में बहुउद्देशीय एवं निःशुल्क चिकित्सा शिविरों की एक विस्तृत श्रृंखला आयोजित की जाएगी। इन शिविरों में केवल सामान्य स्वास्थ्य परीक्षण ही नहीं होगा, बल्कि विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा जटिल रोगों की जांच, निःशुल्क दवाओं का वितरण और जरूरतमंद दिव्यांगजनों को आधुनिक कृत्रिम अंग व सहायक उपकरण भी उपलब्ध कराए जाएंगे। अस्पतालों में जाकर उपचाराधीन मरीजों के बीच फल वितरण, रक्तदान शिविरों के माध्यम से रक्तकोषों को समृद्ध करना और वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष स्वास्थ्य देखभाल परामर्श की व्यवस्था करना इस अभियान को एक संवेदनशील और करुणापूर्ण स्वरूप प्रदान करेगा। अक्टूबर का महीना भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दो महान पुरोधों—राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और सादगी के प्रतीक पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की पावन जयंती का साक्षी बनता है। दो अक्टूबर को यह अभियान अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचेगा, जब पूरे राज्य में स्वदेशी अपनाने और ‘वोकल फॉर लोकल’ के संकल्प को एक जन-अभियान का रूप दिया जाएगा। सरकारी कार्यालयों से लेकर शैक्षणिक संस्थानों तक, नागरिकों को खादी और स्थानीय हस्तशिल्प को अपनी दैनिक जीवनशैली में शामिल करने की शपथ दिलाई जाएगी।
उत्तराखंड के संदर्भ में स्वदेशी का अर्थ केवल एक नारा नहीं, बल्कि पर्वतीय आर्थिकी की रीढ़ है। हमारे पारंपरिक उत्पाद—जैसे मंडुआ (रागी), झंगोरा, पहाड़ी दालें (गहत और भट्ट), लाल चावल, स्थानीय बुरांश और माल्टा के जूस, रिंगाल के हस्तशिल्प और ऊनी वस्त्र—जब तक हमारे स्वयं के घरों और बाजारों में प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं करेंगे, तब तक स्थानीय किसानों और कारीगरों की आजीविका सुरक्षित नहीं हो सकती। दो अक्टूबर को विद्यालयों और सामुदायिक केंद्रों में ‘फिट इंडिया’ गतिविधियों के जरिए जहां एक ओर शारीरिक स्वास्थ्य और योग का महत्व बताया जाएगा, वहीं दूसरी ओर स्थानीय मेलों और प्रदर्शनियों के माध्यम से स्थानीय उत्पादों की बिक्री और उनके प्रचार-प्रसार को अभूतपूर्व गति दी जाएगी। देहरादून के जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि इस विशाल आयोजन की सफलता किसी एक विभाग के कंधों पर नहीं टिक सकती। पंचायती राज, ग्रामीण विकास, शहरी विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, युवा कल्याण, खेल, संस्कृति, पर्यटन और पुलिस प्रशासन—इन सभी रेखीय विभागों को पूरी तरह से आपसी समन्वय और टीम भावना के साथ काम करना होगा। किसी भी स्तर पर संवादहीनता या लालफीताशाही इस पुनीत उद्देश्य को बाधित न कर सके, इसके लिए सटीक कार्ययोजना और समयबद्ध निगरानी तंत्र स्थापित किया गया है। सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को यह निर्देश दिए गए हैं कि वह आधुनिक डिजिटल मीडिया, सोशल प्लेटफॉर्म्स, प्रिंट मीडिया और पारंपरिक लोक-माध्यमों (जैसे नुक्कड़ नाटक और मुनादी) का भरपूर उपयोग करे, ताकि समाज का कोई भी व्यक्ति इस अभियान की जानकारी और भागीदारी से वंचित न रहे। अंततः, सेवा संकल्प अभियान को किसी प्रशासनिक कैलेंडर की तारीखों तक सीमित आयोजन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह वास्तव में देवभूमि के सामूहिक संकल्प की परीक्षा और उसका उत्सव है।
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हिमालय की संवेदनशील वादियां हमसे जिस सादगी, स्वच्छता और संरक्षण की मांग करती हैं, यह अभियान उसी दिशा में एक सामूहिक पदयात्रा है। जब एक अधिकारी अपनी कुर्सी छोड़कर सफाई में हाथ बंटाता है, जब एक डॉक्टर दूरस्थ गांव में पहुंचकर किसी बुजुर्ग का हाथ थामता है, जब एक युवा अपने गांव की समस्या का हल खोजने के लिए दिन-रात मेहनत करता है, और जब एक सामान्य नागरिक सड़क पर कचरा फेंकने से रुककर उसे कूड़ेदान में डालता है—तभी एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित समाज का निर्माण होता है। आगामी 15 सितंबर से 18 अक्टूबर की यह समयावधि उत्तराखंड के जन-जीवन में सेवा, समर्पण और स्वाभिमान का एक नया अध्याय लिखने जा रही है, जो आने वाले वर्षों तक समाज को राष्ट्र निर्माण के मार्ग पर चलने की निरंतर प्रेरणा देता रहेगा। (Dehradun Sewa Sankalp Abhiyan Launch 2026 News)








