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Uttarakhand News: चेन्नई में आयोजित ‘इंडिया इंटरनेशनल फिल्म टूरिज्म कॉन्क्लेव में उत्तराखंड फिल्म नीति की हुई सराहना

On: September 9, 2026 9:45 AM
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Uttarakhand News: चेन्नई में आयोजित ‘इंडिया इंटरनेशनल फिल्म टूरिज्म कॉन्क्लेव में उत्तराखंड फिल्म नीति की हुई सराहना
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Uttarakhand News: सिनेमा और प्रकृति का रिश्ता हमेशा से बेहद गहरा और अटूट रहा है। जब किसी खूबसूरत कहानी को कैमरे के जरिए पर्दे पर उतारा जाता है, तो उस कहानी की रूह अक्सर उसकी पृष्ठभूमि में छुपी वादियों, नदियों, जंगलों और पहाड़ों से ही निकलकर आती है। भारतीय सिनेमा का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जब भी किसी निर्देशक ने अपनी कल्पना को विस्तार देना चाहा, उसने किसी ऐसे स्थान की तलाश की जो उसकी कहानी को जीवंत बना सके। आज के दौर में जब दर्शक पर्दे पर कुछ नया, मौलिक और मनमोहक देखना चाहते हैं, तब शूटिंग लोकेशंस का चयन किसी भी प्रोजेक्ट की सफलता का एक बहुत बड़ा पैमाना बन चुका है। इसी कड़ी में देवभूमि उत्तराखंड अब केवल आध्यात्मिक और प्राकृतिक पर्यटन तक सीमित न रहकर भारतीय और वैश्विक सिनेमा का एक बेहद सशक्त और पसंदीदा ठिकाना बनकर उभर रहा है।

हाल ही में तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में आयोजित ‘इंडिया इंटरनेशनल फिल्म टूरिज्म कॉन्क्लेव-साउथ’ में उत्तराखंड की इसी सिने-क्षमता का भव्य प्रदर्शन देखने को मिला। इस अंतरराष्ट्रीय स्तर के मंच पर देश और दुनिया के जाने-माने फिल्म निर्माताओं, निर्देशकों, प्रोडक्शन हाउसों और विभिन्न देशों के फिल्म आयोगों के प्रतिनिधियों का जमावड़ा लगा था। दक्षिण भारत, जो अपने तकनीकी रूप से उन्नत, भव्य और विषय-प्रधान सिनेमा के लिए पूरी दुनिया में पहचाना जाता है, वहां के फिल्मकारों के सामने उत्तराखंड की नई फिल्म नीति और राज्य की असीम प्राकृतिक छटा को एक संपूर्ण पैकेज के रूप में पेश किया गया। इस पूरे आयोजन में उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद की सक्रिय भागीदारी ने यह साबित कर दिया कि राज्य सरकार अब केवल पर्यटकों को ही नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर रचनात्मक उद्योगों को भी अपनी धरती से जोड़ने के लिए पूरी तरह गंभीर और तत्पर है।

कॉन्क्लेव के माहौल में उस वक्त खास हलचल देखने को मिली जब प्रसार भारती के नए ओटीटी मंच ‘वेव्स’, उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद और महाराष्ट्र फिल्म, स्टेज एंड कल्चरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन सहित तमाम बड़े प्रदर्शकों ने अपने-अपने राज्यों और उपक्रमों की ताकत का प्रदर्शन किया। इसके साथ ही ट्यूनीशिया, इटली, थाईलैंड, रोमानिया, हंगरी, सर्बिया और अजरबैजान जैसे उन देशों के प्रतिनिधि भी मंच पर मौजूद थे जो वैश्विक स्तर पर फिल्म निर्माण को लुभाने के लिए जाने जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की इस भारी मौजूदगी के बीच उत्तराखंड की प्रस्तुति ने सबका ध्यान इसलिए आकर्षित किया क्योंकि यहां न केवल बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियां, घने देवदार के जंगल, कलकल बहती नदियां और शांत झीलें मौजूद हैं, बल्कि इनके साथ-साथ सरकार की ओर से दिया जा रहा ढांचागत और आर्थिक सहयोग भी बेहद पारदर्शी और व्यावहारिक है।

उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद के नोडल अधिकारी के.एस. चौहान ने कॉन्क्लेव के दौरान राज्य की संभावनाओं को बहुत ही सधे हुए और आत्मीय अंदाज में सामने रखा। उन्होंने साफ किया कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व और मार्गदर्शन में राज्य सरकार ने फिल्म निर्माण को केवल एक सांस्कृतिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक संपूर्ण आर्थिक और रोजगारोन्मुखी तंत्र के रूप में स्वीकार किया है। सरकार का यह स्पष्ट मानना है कि जब कोई फिल्म यूनिट किसी इलाके में शूटिंग के लिए पहुंचती है, तो वह अपने साथ केवल कैमरे और कलाकार नहीं लाती, बल्कि वह उस पूरे इलाके की स्थानीय अर्थव्यवस्था में एक नई जान फूंक देती है। होटल व्यवसायियों से लेकर छोटे दुकानदारों, टैक्सी चालकों, स्थानीय कलाकारों और तकनीकी सहायकों तक, हर वर्ग को सीधे तौर पर आजीविका के नए साधन मिलते हैं। इसी दूरगामी सोच को ध्यान में रखकर राज्य की संशोधित और आधुनिक फिल्म नीति को जमीन पर उतारा गया है। इस नीति की सबसे बड़ी और आकर्षक विशेषता वह आर्थिक संबल है जो फिल्म निर्माताओं को अपनी ओर खींच रहा है। आज के समय में जब किसी बड़े बजट की फिल्म का निर्माण होता है, तो निर्माता हमेशा उन राज्यों को प्राथमिकता देते हैं जहां बजट का कुछ हिस्सा सब्सिडी के जरिए वापस मिल सके।

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Photo- International Film Tourism Conclave Celebrates Cinema

उत्तराखंड सरकार ने इस नब्ज को बहुत बारीकी से पकड़ा है। राज्य में शूट होने वाली हिंदी और अन्य मान्यता प्राप्त भारतीय भाषाओं की फीचर फिल्मों के लिए सरकार तीन करोड़ रुपये तक की अनुदान सहायता यानी सब्सिडी दे रही है। यह अनुदान किसी भी स्वतंत्र या बड़े प्रोडक्शन हाउस के लिए जोखिम को काफी हद तक कम कर देता है। इसके अलावा, बदलते दौर में जब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और वेब सीरीज का बोलबाला है, उत्तराखंड सरकार ने अपनी नीति का दायरा बढ़ाते हुए वेब सीरीज और विदेशी प्रोजेक्ट्स को भी इस सब्सिडी योजना के दायरे में शामिल किया है। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर के फिल्मकारों में भी राज्य को लेकर एक नया उत्साह देखने को मिल रहा है। पैसों की सहायता अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन एक फिल्म निर्माता के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है शूटिंग के दौरान मिलने वाली सरकारी अनुमतियां और लालफीताशाही की अड़चनें। कई बार ऐसा होता है कि खूबसूरत लोकेशन होने के बावजूद जटिल कागजी प्रक्रियाओं और अलग-अलग विभागों के चक्कर काटने के डर से निर्माता वहां जाने से कतराते हैं।

उत्तराखंड ने इस समस्या का स्थायी और तकनीकी समाधान निकाला है। राज्य में अब शूटिंग की अनुमति लेने के लिए किसी भी निर्माता को सरकारी दफ्तरों के फेरे लगाने की जरूरत नहीं है। सिंगल विंडो क्लीयरेंस सिस्टम के माध्यम से पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया गया है। आवेदन करने के मात्र सात दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से सभी संबंधित विभागों की एनओसी और शूटिंग की मंजूरी जारी कर दी जाती है। प्रशासनिक सुगमता का यह स्तर देश के चुनिंदा राज्यों में ही देखने को मिलता है। इतना ही नहीं, निर्माताओं के वित्तीय बोझ को और कम करने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने सार्वजनिक स्थलों पर लगने वाले शूटिंग शुल्क को पूरी तरह से माफ कर दिया है। दूरदराज की वादियों या ऐतिहासिक धरोहरों पर फिल्मांकन के दौरान सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम स्थानीय प्रशासन और पुलिस द्वारा सुनिश्चित किया जाता है ताकि यूनिट बिना किसी भय या व्यवधान के काम कर सके। साथ ही, शूटिंग दलों के ठहरने और भोजन आदि की व्यवस्था को किफायती बनाने के लिए गढ़वाल मंडल विकास निगम और कुमाऊं मंडल विकास निगम के तमाम विश्राम गृहों तथा होटलों में विशेष रियायती दरें उपलब्ध कराई जा रही हैं। यह तमाम सहूलियतें मिलकर उत्तराखंड को एक ऐसा मुफीद माहौल देती हैं जहां निर्देशक सिर्फ अपनी कला पर ध्यान केंद्रित कर पाता है, बाकी व्यवस्थाओं की चिंता सरकारी तंत्र खुद संभाल लेता है। इन नीतियों और व्यावहारिक कदमों का सकारात्मक परिणाम अब आंकड़ों में भी साफ झलक रहा है।

आंकड़ों के मुताबिक, मौजूदा समय में हर साल दो सौ से भी अधिक फिल्में, वेब सीरीज, धारावाहिक और संगीत वीडियो उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में फिल्माए जा रहे हैं। देहरादून, मसूरी, ऋषिकेश और नैनीताल जैसे पारंपरिक पर्यटन स्थलों से आगे बढ़कर अब कैमरे चकराता, औली, मुनस्यारी, हर्षिल, टिहरी झील और पिथौरागढ़ की अनदेखी घाटियों तक पहुंच रहे हैं। इससे न केवल स्थानीय स्तर पर प्रतिवर्ष हजारों मानव दिवसों का रोजगार सृजित हो रहा है, बल्कि उन युवाओं को भी अपनी ही धरती पर सिनेमाई विधा सीखने और मुख्यधारा से जुड़ने का मौका मिल रहा है जो कभी काम की तलाश में मुंबई या दक्षिण के शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर थे। चेन्नई के इस आयोजन का एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू वह व्यक्तिगत और सीधी बातचीत रही जो तमिल फिल्म उद्योग के शीर्ष निर्माताओं और निर्देशकों के साथ आयोजित की गई। दक्षिण भारतीय सिनेमा, विशेष रूप से तमिल और तेलुगु उद्योग, अपनी भव्यता, बड़े पैमाने के आउटडोर दृश्यों और अनोखी कहानियों के लिए जाना जाता है। आम तौर पर दक्षिण की फिल्में शूटिंग के लिए स्विट्जरलैंड, जॉर्जिया, बुडापेस्ट या अन्य यूरोपीय देशों का रुख करती रही हैं, जिससे उनका बजट अत्यधिक बढ़ जाता है। के.एस. चौहान ने जब तमिल फिल्मकारों के सामने यह तथ्य रखा कि जो यूरोप जैसी बर्फ, जंगल और वास्तुकला वे सात समंदर पार ढूंढते हैं, वह सब कुछ बेहद कम लागत और भरपूर सरकारी सहयोग के साथ भारत के भीतर ही उत्तराखंड में उपलब्ध है, तो कई प्रतिष्ठित प्रोडक्शन हाउसों ने तुरंत अपनी उत्सुकता दिखाई।

लाइका प्रोडक्शंस, जिसने ‘पोंनियिन सेल्वन’ जैसी ऐतिहासिक भव्य फिल्में बनाई हैं, उसके अलावा इंडिया टॉकीज, स्टोन बीच स्टूडियो, गिरीश प्रधान, अमेरिका आधारित बीटीजीआई प्रोडक्शंस, पारसा पिक्चर, मसाला पिक्स, कवि क्रिएशन्स और ड्रीम वारियर पिक्चर्स जैसे बड़े और स्थापित बैनरों के साथ गंभीर मंत्रणा हुई। इन प्रोडक्शन हाउसों के प्रतिनिधियों ने राज्य की लोकेशंस की तस्वीरों, वीडियो फुटेज और सिंगल विंडो सिस्टम की शर्तों को समझा और अपनी आगामी परियोजनाओं की आउटडोर शूटिंग उत्तराखंड में करने के प्रति गहरी रुचि व्यक्त की। दक्षिण के फिल्मकारों का यह झुकाव इस बात का पुख्ता संकेत है कि आने वाले समय में तमिल सिनेमा के बड़े सितारे उत्तराखंड की वादियों में अभिनय करते नजर आएंगे, जिससे दोनों क्षेत्रों के बीच एक मजबूत सांस्कृतिक और रचनात्मक सेतु भी तैयार होगा। उत्तराखंड के पास जो सबसे अनमोल संपत्ति है, वह है उसका भूगोल और संस्कृति। यहां कुछ ही घंटों के सफर में मैदानी हरियाली से निकलकर घने जंगलों, उफनती नदियों और फिर सीधे हिमाच्छादित शिखरों तक पहुंचा जा सकता है।

इसके साथ ही राज्य का शांत, अपराधमुक्त और सौहार्दपूर्ण वातावरण किसी भी आउटडोर शूट के लिए आदर्श माना जाता है। स्थानीय लोगों की सरलता, सहयोगात्मक व्यवहार और प्रकृति के प्रति उनका जुड़ाव फिल्म क्रू को एक घर जैसा सुकून देता है। राज्य सरकार का अंतिम ध्येय यही है कि इस नैसर्गिक वरदान को एक आधुनिक और सुगम व्यवस्था के साथ जोड़कर उत्तराखंड को देश और विदेश के फिल्मकारों की स्वाभाविक पहली पसंद बना दिया जाए। चेन्नई का यह कॉन्क्लेव इस बात का साक्षी बना कि जब कोई राज्य अपनी खूबियों को आत्मविश्वास और ठोस नीतियों के साथ दुनिया के सामने रखता है, तो अवसर खुद-ब-खुद चलकर आते हैं। दक्षिण के इस विशाल मंच से उत्तराखंड ने न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता का संदेश दिया, बल्कि यह भी साबित किया कि वह आधुनिक फिल्म निर्माण की हर कसौटी पर खरा उतरने के लिए तैयार है। आने वाले वर्षों में जब इन वार्ताओं के नतीजे सिल्वर स्क्रीन पर दिखाई देंगे, तो यह न केवल उत्तराखंड के फिल्म टूरिज्म को एक नए शिखर पर ले जाएगा, बल्कि राज्य की आर्थिकी और स्थानीय प्रतिभाओं के लिए भी एक स्वर्णिम युग की शुरुआत साबित होगा।

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