DM Road Cutting Action News: देहरादून घाटी की पहचान कभी अपनी मंद-सुगंधित बयार, लीची के विशाल बागानों, शांत जीवनशैली और साफ-सुथरी चौड़ी सड़कों के रूप में हुआ करती थी। देश के कोने-कोने से लोग यहां सुकून की तलाश में आते थे और अपनी सेवानिवृत्ति के बाद का जीवन बिताने के लिए इस शहर को सबसे मुफीद मानते थे। किंतु बीते दो दशकों में जिस तीव्र गति से देहरादून का विस्तार हुआ है, उसने इस शांत पर्वतीय शहर के चेहरे को पूरी तरह बदलकर रख दिया है।

राज्य गठन के बाद राजधानी बनने का गौरव तो इस शहर को मिला, लेकिन इसके साथ ही आई अनियंत्रित जनसंख्या की बाढ़, भारी वाहनों का दबाव और कंक्रीट का ऐसा संजाल जिसने शहर की मूल पहचान को लील लिया। आज यह शहर विकास की एक ऐसी अंधी दौड़ से जूझ रहा है जहां पुरानी सुविधाओं को उखाड़कर नई सुविधाएं बिछाने का काम तो चल रहा है, लेकिन उस प्रक्रिया में शहर के बाशिंदों के दैनिक जीवन की शांति और सुरक्षा दांव पर लग चुकी है। देहरादून के किसी भी कोने में कदम रखिए, चाहे वह व्यस्त चकराता रोड हो, ऐतिहासिक राजपुर रोड, धर्मपुर की घनी बस्तियां हों या हरिद्वार बाईपास से जुड़ती उपनगरीय सड़कें—हर तरफ धूल के उड़ते गुबार, मलबे के ऊंचे ढेर, खुदी हुई नालियां और लोहे की बेतरतीब बैरिकेडिंग देखने को मिल जाएगी। शहर में

बुनियादी ढांचे के सुदृढ़ीकरण के नाम पर कई तरह के काम एक साथ चल रहे हैं।
कहीं एशियाई विकास बैंक (एडीबी) के वित्तपोषण से सीवरेज की बड़ी लाइनें बिछाई जा रही हैं, कहीं अमृत योजना के तहत पेयजल की पाइपलाइन डाली जा रही है, तो कहीं स्मार्ट सिटी परियोजना के अंतर्गत बिजली के झूलते तारों को जमीन के नीचे दबाने की कवायद हो रही है। इसके अलावा निजी दूरसंचार कंपनियां अपनी ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाने के लिए आए दिन सड़कों को छलनी करती रहती हैं। इन सभी परियोजनाओं का उद्देश्य निश्चित रूप से भविष्य के आधुनिक देहरादून को तैयार करना है, किंतु सबसे बड़ा और दुखद पहलू यह है कि इस वर्तमान निर्माण कार्य की योजना इतनी लचर, असंगठित और असंवेदनशील है कि इसने आम नागरिकों का सड़क पर निकलना दूभर कर दिया है। सड़कें खोदी तो बेहद तत्परता के साथ जाती हैं, लेकिन जैसे ही गड्ढा खोदकर पाइप या केबल बिछा दी जाती है, कार्यदायी एजेंसियां वहां से अचानक नदारद हो जाती हैं। खुदी हुई खाई को मिट्टी और मलबे से ऐसे ही भर दिया जाता है, जिसे न तो ठीक से समतल किया जाता है और न ही उस पर डामर चढ़ाया जाता है। परिणाम यह होता है कि हल्की सी बारिश पड़ते ही वह मिट्टी दलदल में बदल जाती है और धूप निकलते ही बारीक धूल बनकर हवा में तैरने लगती है। दून घाटी का पर्यावरण जो कभी अपनी शुद्धता के लिए प्रसिद्ध था, आज हवा में मौजूद पीएम 10 और पीएम 2.5 के खतरनाक स्तरों के चलते दमा, ब्रोंकाइटिस और सांस के मरीजों की संख्या बढ़ा रहा है। सबसे अधिक मार झेलते हैं स्कूल जाते नन्हें बच्चे, बुजुर्ग और दोपहिया वाहन चालक। धूल भरी आंखों से वाहन चलाना अपने आप में जानलेवा होता है, ऊपर से सड़क के बीचों-बीच छूटे गहरे गड्ढे किसी भी समय गंभीर सड़क दुर्घटना का कारण बन जाते हैं। कई जगहों पर तो रात के अंधेरे में सड़क धंसने से वाहन सीधे गड्ढों में समा चुके हैं। जब विकास की यह आपाधापी जनजीवन के लिए खतरा बन जाए, तो शासन और प्रशासन की जिम्मेदारी केवल दर्शक बने रहने की नहीं रह जाती। इसी असहनीय स्थिति को संज्ञान में लेते हुए देहरादून के जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने मोर्चा संभाला है। कलेक्ट्रेट परिसर स्थित ऋषिपर्णा सभागार में रोड कटिंग समिति की एक बेहद अहम और निर्णायक बैठक बुलाई गई। सभागार में माहौल पूरी तरह गंभीर था क्योंकि इस बार केवल प्रगति की औपचारिकता पूरी नहीं की जानी थी, बल्कि विभिन्न विभागों के बीच दशकों से चली आ रही समन्वय की कमी और कार्यदायी संस्थाओं की लापरवाही पर सीधा प्रहार किया जाना था।

बैठक की मेज पर लोक निर्माण विभाग, नगर निगम, जल निगम, जल संस्थान, उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) के साथ-साथ स्मार्ट सिटी परियोजना और निजी एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारी व मुख्य अभियंता उपस्थित थे। जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने बैठक की शुरुआत में ही बेहद कड़े शब्दों में साफ कर दिया कि देहरादून में चल रहे निर्माण कार्यों के दौरान जनसुरक्षा और जनसुविधा के साथ रत्ती भर भी समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने उपस्थित अभियंताओं और अधिकारियों से दो टूक कहा कि विकास का कोई भी ऐसा मॉडल स्वीकार नहीं किया जा सकता जो नागरिकों की जान को जोखिम में डाले। अब तक जो कार्यशैली चल रही थी, जिसमें एक विभाग सड़क बनाता था और दूसरा विभाग हफ्ता भर बाद आकर उसे दोबारा खोद डालता था, वह पूरी तरह प्रशासनिक अक्षमता का प्रतीक है। जनता के टैक्स के पैसे की इस बर्बादी और उनके धैर्य की इस परीक्षा को तत्काल प्रभाव से समाप्त करना होगा। बैठक का मुख्य ध्येय केवल फाइलों में अंकित आंकड़ों की समीक्षा करना नहीं था, बल्कि सड़कों पर फैली अव्यवस्था को तय समय में सुधारने का एक कठोर रोडमैप तैयार करना था। समीक्षा के उपरांत जिलाधिकारी ने सबसे बड़ा कदम उठाते हुए 10 से 25 सितंबर तक पूरे जनपद में एक सघन, विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि इस पंद्रह दिवसीय अवधि को प्रथम चरण के रूप में लेते हुए हर कार्यदायी संस्था को एक युद्धस्तर के मिशन मोड में काम करना होगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि इस दौरान कोई भी संस्था नया काम शुरू करने के बजाय पहले से खुदे पड़े कार्यों को अंतिम मुकाम तक पहुंचाएगी। जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि जितनी भी सड़कों पर पाइपलाइन, केबल या सीवर डालने का काम पूरा हो चुका है, वहां अतिरिक्त मैनपावर लगाई जाए, अत्याधुनिक डामरीकरण मशीनरी लाई जाए और रात-दिन काम करके सड़कों का मूल स्वरूप बहाल किया जाए। सड़क की रिस्टोरेशन का मतलब केवल मिट्टी बराबर करना नहीं है, बल्कि लोक निर्माण विभाग के मानकों के अनुरूप उच्च गुणवत्ता वाला डामरीकरण करना होगा ताकि सड़क पहले की तरह चिकनी, मजबूत और सुरक्षित बन सके। इस अभियान को मात्र कागजी फरमान बनने से रोकने के लिए प्रशासन ने समयसीमा की एक बेहद सख्त लक्ष्मण रेखा खींच दी है। अब तक होता यह था कि रोड कटिंग की अनुमति मिलने के बाद एजेंसियां महीनों तक काम लटकाए रखती थीं और ठेकेदार अपनी सुविधानुसार काम करते थे। जिलाधिकारी ने इस परंपरा को जड़ से समाप्त करते हुए आदेश दिया कि जिन भी विभागों या निजी संस्थाओं को रोड कटिंग की अनुमति दी गई है, उनसे कार्य समाप्ति की एक स्पष्ट और लिखित समयबद्ध घोषणा ली जाए। प्रत्येक स्वीकृत कार्य को अनुमति मिलने के अधिकतम 15 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से शत-प्रतिशत पूर्ण करना होगा। इस 15 दिन की अवधि में खुदाई, लाइन बिछाना, गड्ढा भरना और अंतिम स्तर का डामरीकरण यानी रिस्टोरेशन सब कुछ शामिल है। यदि कोई भी एजेंसी इस तय समयसीमा का उल्लंघन करती है या लापरवाही बरतती है, तो उसके विरुद्ध न केवल दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी बल्कि भारी आर्थिक जुर्माना लगाते हुए उसे भविष्य के कार्यों के लिए ब्लैकलिस्ट करने की संस्तुति शासन को भेज दी जाएगी। इसके साथ ही संबंधित विभाग के प्रभारी इंजीनियर के खिलाफ भी विभागीय जांच बैठाई जाएगी। अक्सर देखा गया है कि निर्माण स्थलों पर सुरक्षा के बुनियादी मानकों की घोर अनदेखी की जाती है। ठेकेदार गड्ढा खोदकर एक छोटा सा पत्थर या प्लास्टिक का फीता बांधकर चले जाते हैं, जो रात के समय दूर से कतई दिखाई नहीं देता। देहरादून की सड़कों पर स्ट्रीट लाइटों की स्थिति हर जगह एक जैसी नहीं है, ऐसे में अचानक सामने आए गड्ढे से टकराकर लोग अपनी जान गंवा देते हैं। जिलाधिकारी ने इस बिंदु पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए निर्देश दिया कि किसी भी कार्यस्थल को असुरक्षित नहीं छोड़ा जाएगा। जहां भी काम चल रहा हो, वहां मजबूत लोहे की बैरिकेडिंग, रेडियम वाले चेतावनी संकेतक और रात में चमकने वाले रिफ्लेक्टर अनिवार्य रूप से लगाए जाएं। जिन मुख्य चौराहों या व्यस्त मार्गों पर काम हो रहा है, वहां एजेंसी को अपने खर्चे पर पर्याप्त प्रकाश की व्यवस्था करनी होगी ताकि रात में गुजरने वाले किसी भी नागरिक को दूर से ही खतरे का आभास हो सके। यदि किसी निर्माण स्थल पर सुरक्षा उपायों की कमी पाई गई, तो काम को तत्काल रोकते हुए एजेंसी पर मुकदमा दर्ज कराने तक की चेतावनी दी गई है। कागजी दावों और धरातल की वास्तविक स्थिति के बीच का अंतर पाटने के लिए आधुनिक तकनीक और दैनिक निगरानी का एक त्रिस्तरीय तंत्र स्थापित किया गया है। जिलाधिकारी ने कलेक्ट्रेट के केंद्रीय कंट्रोल रूम को सीधे इस अभियान की निगरानी से जोड़ने के निर्देश दिए हैं। अब जिले में जहां-जहां भी रोड कटिंग और मरम्मत का कार्य चल रहा है, वहां से दैनिक रिपोर्ट कंट्रोल रूम को भेजी जाएगी। एक विशेष प्रशासनिक निगरानी टीम बनाई गई है जो रैंडम आधार पर मौके पर जाकर फोटोग्राफिक और वीडियोग्राफिक साक्ष्य जुटाएगी। कंट्रोल रूम में यह पूरा रिकॉर्ड रखा जाएगा कि किस वार्ड, मोहल्ले या सड़क पर किस एजेंसी ने कब काम शुरू किया, 15 दिन की अवधि में कितना काम हुआ और क्या सड़क को मानकों के अनुरूप दुरुस्त किया गया।
दैनिक प्रगति का यह ब्योरा प्रतिदिन जिलाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। इस व्यवस्था से किसी भी अधिकारी या ठेकेदार के लिए बहानेबाजी की कोई गुंजाइश नहीं बचेगी। भविष्य में शहर को ऐसी बदहाली से बचाने के लिए जिलाधिकारी ने नई रोड कटिंग अनुमतियों के नियम पूरी तरह बदल दिए हैं। अब किसी भी संस्था को केवल एक सामान्य प्रार्थना पत्र पर अनुमति नहीं दी जाएगी। नई व्यवस्था के तहत अब तीन प्रमुख अधिकारियों की संयुक्त अनापत्ति रिपोर्ट के बाद ही अनुमति पत्र जारी होगा। संबंधित क्षेत्र के उप जिलाधिकारी (एसडीएम), पुलिस क्षेत्राधिकारी (सीओ ट्रैफिक) और लोक निर्माण विभाग के अधीक्षण अभियंता पहले मौके पर जाकर संयुक्त स्थलीय निरीक्षण करेंगे। यह टीम देखेगी कि क्या उस क्षेत्र में खुदाई करने से पूरा ट्रैफिक जाम हो जाएगा, क्या उस इलाके में ट्रैफिक डायवर्जन के लिए कोई सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग मौजूद है और क्या संबंधित एजेंसी के पास कार्य को पंद्रह दिन में पूरा करने के लिए पर्याप्त श्रमिक और सामग्री मौजूद है। इन तीनों अधिकारियों की सकारात्मक संस्तुति और स्पष्ट रिपोर्ट के बाद ही फाइल आगे बढ़ेगी। इससे शहर में एक साथ दर्जनों सड़कों को खोदने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी और चरणबद्ध तरीके से काम हो सकेगा। इस महत्वपूर्ण बैठक में केवल सड़कों की बदहाली पर ही बात नहीं हुई, बल्कि शहर के एक अत्यंत संवेदनशील और पुराने नासूर यानी सीमाद्वार क्षेत्र में होने वाले भीषण जलभराव पर भी विस्तृत मंथन हुआ। सीमाद्वार क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि हल्की बारिश होते ही मुख्य मार्ग और आसपास की कॉलोनियां तालाब में तब्दील हो जाती हैं। घरों के भीतर गंदा पानी घुस जाता है और कई-कई दिनों तक जनजीवन ठप पड़ जाता है। जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने पिछले महीने स्वयं इस क्षेत्र का स्थलीय निरीक्षण किया था और स्थानीय नागरिकों की पीड़ा को अपनी आंखों से देखा था। उस समय उन्होंने लोक निर्माण विभाग को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि इस समस्या का कोई कामचलाऊ समाधान नहीं, बल्कि एक मुकम्मल और स्थायी तकनीकी समाधान निकाला जाए। बैठक में लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों ने जिलाधिकारी को सूचित किया कि पूर्व में दिए गए निर्देशों का अक्षरशः पालन करते हुए सीमाद्वार क्षेत्र के जलभराव के स्थायी समाधान हेतु एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कर ली गई है। इस डीपीआर में आधुनिक ड्रेनेज सिस्टम, पानी की त्वरित निकासी के लिए बड़े भूमिगत चैनल और प्राकृतिक जलस्रोतों तक पानी को सुरक्षित पहुंचाने का पूरा तकनीकी खाका खींचा गया है।
यह रिपोर्ट वित्तीय और प्रशासनिक स्वीकृति के लिए शासन को भेजी जा रही है। जिलाधिकारी ने निर्देश दिए कि शासन स्तर पर लगातार पैरवी करके इस डीपीआर को जल्द से जल्द पास कराया जाए और बजट मिलते ही धरातल पर काम शुरू हो ताकि अगली बरसात आने से पहले सीमाद्वार के निवासियों को जलभराव के इस पुराने अभिशाप से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति मिल सके। विकास और जनजीवन का संतुलन साधना किसी भी जीवंत शहर के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है। देहरादून आज अपने इतिहास के एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसे आधुनिक महानगर की सुविधाएं भी चाहिए, लेकिन अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शांत आबोहवा और जन-सुलभता को खोए बिना। जिलाधिकारी की यह बैठक और उनके द्वारा दिए गए कड़े निर्देश इसी बात का प्रमाण हैं कि जब प्रशासनिक इच्छाशक्ति मजबूत होती है, तो व्यवस्थागत खामियों को सुधारा जा सकता है। विभिन्न विभागों का अलग-अलग द्वीप की तरह काम करना किसी भी शहर को बर्बाद कर सकता है। जब जल संस्थान, विद्युत निगम और लोक निर्माण विभाग एक साथ बैठकर समय सारिणी तय करेंगे, तभी सड़कों की बार-बार होने वाली खुदाई पर रोक लगेगी। सड़कों का सुरक्षित और सुगम होना किसी भी समाज के बुनियादी नागरिक अधिकारों में शामिल है। कोई भी नागरिक यह नहीं चाहता कि उसके द्वारा दिए गए करों से बनने वाली सड़कें चंद दिनों बाद ही गड्ढों में तब्दील हो जाएं और उसे हर दिन अपनी जान हथेली पर रखकर सफर करना पड़े। 10 से 25 सितंबर तक चलने वाला यह विशेष अभियान यदि अपनी पूरी ईमानदारी, पारदर्शिता और तकनीकी मानकों के साथ धरातल पर उतरता है, तो निश्चित रूप से यह देहरादून के जनजीवन के लिए एक बड़ी राहत साबित होगा। शहर को गड्ढामुक्त, धूलमुक्त और सुरक्षित बनाना केवल प्रशासन का कर्तव्य नहीं है, बल्कि यह उस साझी संस्कृति का भी तकाजा है जिसके लिए दून घाटी जानी जाती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रशासनिक सख्ती और विभागों की सक्रियता से दून की सड़कें एक बार फिर सुगम बनेंगी और शहर विकास के साथ-साथ अपनी गरिमा और जनसुरक्षा को भी बनाए रखने में सफल होगा।
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