Uttarakhand Congress March: उत्तराखंड की शांत वादियों और आध्यात्मिक आभा से सराबोर देवभूमि के सार्वजनिक जीवन में इन दिनों एक अप्रत्याशित और गहरा राजनीतिक तनाव देखने को मिल रहा है। दशकों से जिस राज्य की पहचान सौम्य जनजीवन, आपसी सद्भाव और सहज सह-अस्तित्व के लिए रही है, वहां राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक सीमाओं का दायरा अब सामान्य मतभेदों से कहीं आगे निकलकर सामाजिक मान-मर्यादा के सवालों तक जा पहुंचा है। हल्द्वानी में कांग्रेस पार्टी के कार्यक्रम स्थल के कथित शुद्धिकरण की घटना ने राज्य के राजनीतिक विमर्श को एक ऐसा मोड़ दे दिया है, जिसकी गूंज अब राजधानी देहरादून की सड़कों पर साफ सुनाई देने लगी है। यह विवाद केवल दो परस्पर विरोधी दलों की खींचतान का परिचायक नहीं रह गया है, बल्कि इसने समाज के भीतर लोकतांत्रिक मर्यादा, राजनीतिक विरोध के तौर-तरीकों और सामाजिक समरसता की मूल भावना पर एक नई बहस को जन्म दिया है।

हल्द्वानी के भीतर घटी इस घटना के बाद कांग्रेस संगठन ने इसे अपने राजनीतिक आत्मसम्मान और राज्य की साझी संस्कृति पर सीधा आघात माना। पार्टी की ओर से सोमवार को राजधानी देहरादून के ऐतिहासिक परेड ग्राउंड से मुख्यमंत्री आवास कूच का आह्वान किया गया, जिसमें प्रदेश भर से जुटे कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों की भारी मौजूदगी देखी गई। इस जनसैलाब की अगुवाई प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा, प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य समेत तमाम वरिष्ठ नेताओं ने की। हाथों में तिरंगे और पार्टी के झंडे थामे हजारों की संख्या में पहुंचे कार्यकर्ताओं का आक्रोश इस बात पर केंद्रित था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी विरोधी दल की मौजूदगी को धार्मिक या सामाजिक रूप से अशुद्ध करार देकर गंगाजल छिड़कने अथवा शुद्धिकरण करने की परंपरा आखिर किस दिशा की ओर इशारा करती है।
परेड ग्राउंड से शुरू हुआ यह प्रदर्शन जैसे-जैसे आगे बढ़ा, सड़कों पर तनाव और राजनीतिक गर्माहट दोनों साफ महसूस की जाने लगी। प्रशासनिक अमले ने मुख्यमंत्री आवास की ओर जाने वाले तमाम प्रमुख चौराहों पर बैरिकेडिंग कर रखी थी, जहां पुलिस बल और प्रदर्शनकारियों के बीच नोकझोंक के दृश्य भी सामने आए। प्रदर्शन में शामिल नेताओं का कहना था कि यह सड़क पर उतरने की कोई सामान्य कवायद नहीं है, बल्कि उस खतरनाक प्रवृत्ति को रोकने का संकल्प है जो धीरे-धीरे उत्तराखंड की सामाजिक चेतना को दूषित कर रही है। राजनीतिक दलों के कार्यक्रम, रैलियां और सभाएं लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग रही हैं, जहां विचार टकराते हैं, सरकार की नीतियों पर सवाल उठते हैं और जनता के मुद्दे उठाए जाते हैं। परंतु किसी राजनीतिक आयोजन के बाद उस पूरे स्थल को अपवित्र घोषित कर शुद्धिकरण की नौटंकी करना न केवल राजनीति के न्यूनतम शिष्टाचार का उल्लंघन है, बल्कि उन लोगों के अस्तित्व को भी नकारने का कुत्सित प्रयास है जो उस विचार से जुड़े हैं।

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने इस पूरे मामले को सीधे तौर पर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक संकीर्णता से जोड़ा। पार्टी का तर्क है कि जब कोई सरकार या उसका समर्थक वर्ग विकास, रोजगार, स्वास्थ्य और बुनियादी मुद्दों पर जवाब देने की स्थिति में नहीं होता, तब वह इस प्रकार के भावनात्मक और प्रतीकात्मक हथकंडों का सहारा लेकर जनमानस को बांटने की कोशिश करता है। कांग्रेस का सवाल बेहद सीधा और तीखा है कि यदि सत्ता पक्ष का मूल मंत्र सबका साथ और सबका विकास है, तो फिर अपने ही राज्य के नागरिकों और एक प्रमुख विपक्षी दल के कार्यकर्ताओं को अछूत या अशुद्ध जैसी सोच के दायरे में खड़ा करने वालों पर शासन का रुख मौन क्यों है। इस प्रकार की घटनाओं पर सरकार की खामोशी उन असामाजिक और विभाजनकारी तत्वों को खुला संरक्षण देती प्रतीत होती है जो समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने पर तुले हैं।
इस विशाल विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा ने राज्य के समरस स्वभाव को रेखांकित करते हुए कहा कि देवभूमि की पावन धरती ने हमेशा से संतों, साधकों और आम जनमानस को बिना किसी भेदभाव के अपने आंचल में शरण दी है। इस भूमि पर नफरत, छुआछूत की नई व्याख्याएं और संकीर्ण भेदभाव की कोई जगह नहीं हो सकती। उन्होंने सत्ता पक्ष से यह सवाल सार्वजनिक रूप से पूछा कि उसे यह तय करना होगा कि वह देश के संविधान, समतामूलक समाज और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जवाबदेह है अथवा उन ताकतों का मूक समर्थन कर रहा है जो सामाजिक ताने-बाने को जाति, धर्म और शुचिता के फर्जी पैमानों में समेटना चाहती हैं।
वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने आंदोलनकारियों को संबोधित करते हुए इसे उत्तराखंड की लोक-संस्कृति पर सीधा वार बताया। उन्होंने जोर देकर कहा कि राज्य निर्माण की लड़ाई में हर वर्ग, जाति और धर्म के लोगों ने कंधे से कंधा मिलाकर शहादत दी थी। किसी ने भी यह कल्पना नहीं की थी कि अलग राज्य बनने के दो दशक बाद राजनीति का स्तर इतना गिर जाएगा कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को सामाजिक अस्पृश्यता का रूप दे दिया जाएगा। हल्द्वानी में जो कुछ भी हुआ, वह न केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला था, बल्कि उसने हर उस जागरूक नागरिक को सोचने पर विवश कर दिया है जो समाज में शांति और परस्पर सम्मान का पक्षधर है। कांग्रेस पार्टी किसी भी कीमत पर इस विभाजनकारी एजेंडे को स्वीकार नहीं करेगी और सड़क से लेकर सदन तक इस मानसिकता के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ेगी।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने मामले के कानूनी और संवैधानिक पहलुओं की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए स्पष्ट किया कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन जीने और अपनी विचारधारा को शांतिपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त करने का मौलिक अधिकार देता है। किसी व्यक्ति, समूह अथवा राजनीतिक दल की सार्वजनिक उपस्थिति के उपरांत उस स्थल का तथाकथित शुद्धिकरण करना संविधान की उसी मूल भावना पर कुठाराघात है जो समानता और बंधुत्व की वकालत करती है। शासन-प्रशासन की यह नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी थी कि वह इस प्रकार के कृत्य को तुरंत संज्ञान में लेकर सख्त दंडात्मक कदम उठाता, लेकिन दुर्भाग्यवश प्रशासनिक मशीनरी ऐसे मामलों में पूरी तरह निष्प्रभावी दिखाई दे रही है, जिससे जनता के भीतर असुरक्षा और असंतोष का भाव गहराता जा रहा है।
पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने सरकार की प्राथमिकताओं पर गहरा क्षोभ प्रकट किया। उनका कहना था कि आज राज्य का युवा रोजगार के अभाव में दर-दर भटक रहा है, प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार सामने आ रही गड़बड़ियों ने मेधावी छात्रों के भविष्य को अंधकारमय बना दिया है, पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन की समस्या जस की तस बनी हुई है और किसान अपनी उपज के वाजिब दाम के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इन बुनियादी सवालों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए सुनियोजित ढंग से शुद्धिकरण जैसे पाखंडी मुद्दे खड़े किए जा रहे हैं ताकि मुख्य धारा का विमर्श नफरत और ध्रुवीकरण की धुरी पर घूमता रहे।
राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि उत्तराखंड की राजनीति में इस प्रकार के प्रतीकात्मक कृत्यों का प्रवेश एक चिंताजनक संकेत है। पूर्व में भी वैचारिक टकराव और सत्ता परिवर्तन के दौर आए हैं, मगर कभी भी एक-दूसरे की सार्वजनिक उपस्थिति को अपवित्र मानने जैसी हीन भावना का प्रदर्शन खुले तौर पर नहीं देखा गया था। चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हरक सिंह रावत और सीडब्ल्यूसी सदस्य करण माहरा ने भी इसी बात को दोहराते हुए कहा कि देवभूमि को किसी भी राजनीतिक प्रयोगशाला में तब्दील नहीं होने दिया जाएगा। यह राज्य अपनी सादगी और भाईचारे के लिए जाना जाता है, और जब भी इस सौहार्द पर हमला होगा, राज्य की जनता पूरी एकजुटता के साथ उसका प्रतिकार करेगी।
इस विशाल मार्च के जरिए कांग्रेस पार्टी ने केवल हल्द्वानी प्रकरण तक ही अपनी बात सीमित नहीं रखी, बल्कि राज्य में व्याप्त कई अन्य गंभीर समस्याओं को भी सरकार के खिलाफ आरोप पत्र की तरह पेश किया। वक्ताओं ने राज्य में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों, कानून-व्यवस्था के चरमराते ढांचे, पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों में जमीनों की अंधाधुंध बिक्री और नीलामी के फैसलों पर भी कड़ा एतराज जताया। उप नेता प्रतिपक्ष भुवन कापड़ी, राष्ट्रीय महासचिव गुरदीप सिंह सप्पल और विधायक विक्रम सिंह नेगी समेत कई पूर्व जनप्रनिधियों ने मंच से यह संदेश देने का प्रयास किया कि हल्द्वानी का शुद्धिकरण विवाद केवल एक पृथक घटना नहीं है, बल्कि यह उस बड़े शासनगत संकट का हिस्सा है जहां जनहित के मुद्दे हाशिए पर धकेल दिए गए हैं और विभाजनकारी प्रवृत्तियों को मौन सहमति मिल रही है।

राजधानी में उमड़े इस जनसैलाब ने यह तो तय कर दिया है कि हल्द्वानी की घटना से उपजा यह विवाद आने वाले दिनों में और अधिक राजनीतिक विस्तार लेगा। विपक्ष इस मुद्दे को जन-सम्मान और सामाजिक न्याय की रक्षा के रूप में स्थापित करने की पूरी कोशिश कर रहा है, वहीं सत्ता पक्ष के लिए भी यह जरूरी हो गया है कि वह ऐसे कृत्यों पर अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट करे ताकि राज्य की साझी संस्कृति पर संशय के बादल न छाएं। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी बात में निहित है कि राजनीतिक विरोध चाहे कितना भी प्रखर क्यों न हो, वह मानवीय गरिमा और सामाजिक संतुलन की लक्ष्मण रेखा को कभी पार न करे।
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