CM Dhami Pays Tribute to 1994 Mussoorie Firing Victims News: पहाड़ों की गोद में बसा उत्तराखंड केवल प्राकृतिक सौंदर्य, नदियों के अविरल प्रवाह और तुंग शिखरों की भूमि भर नहीं है। यह माटी उन असंख्य त्यागों, बलिदानों और दीर्घकालिक जनआंदोलनों की साक्षी है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर एक नए राज्य की संकल्पना को साकार रूप दिया था। जब भी उत्तराखंड के प्रादुर्भाव का इतिहास लिखा जाएगा, तब-तब सितंबर 1994 के उन काले और खूनी दिनों की चीत्कार हर संवेदनशील हृदय को झकझोर कर रख देगी। खटीमा की छाती पर चली गोलियों की अनुगूंज अभी थमी भी नहीं थी कि दो सितंबर 1994 को मसूरी की सुरम्य वादियों में न्याय की मांग कर रहे निहत्थे नागरिकों पर सरकारी क्रूरता का जो कहर टूटा, उसने समूची मानवता को स्तब्ध कर दिया था।

उस ऐतिहासिक दौर में मसूरी के झूलाघर पर जुटी भीड़ किसी राजनीतिक सत्ता के विस्तार के लिए नहीं खड़ी थी, बल्कि वह अपने भविष्य, अपनी बोली-भाषा, अपने जल-जंगल-जमीन और अपनी संतानों के स्वाभिमान की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष कर रही थी। हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा शहीद स्थल झूलाघर में आयोजित श्रद्धांजलि सभा को वर्चुअल माध्यम से संबोधित करते हुए दिया गया वक्तव्य केवल एक औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं था, अपितु वह उन शहीदों के प्रति राज्य के सामूहिक ऋण को स्वीकार करने और उनके सपनों के उत्तराखंड को धरातल पर उतारने का खुला घोषणापत्र था। मसूरी गोलीकांड के उस मार्मिक परिदृश्य को याद करते हुए आज भी पहाड़ के हर गांव की आंखें नम हो जाती हैं। उस समय उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सत्ता व्यवस्था ने पहाड़ी क्षेत्रों की विशिष्ट भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को समझे बिना अपनी निरंकुशता थोपने की चेष्टा की थी। आम जनता यह समझ चुकी थी कि लखनऊ की सत्ता से सैकड़ों मील दूर बीहड़ पहाड़ियों में रहने वाले लोगों की पीड़ा का समाधान अलग राज्य बने बिना संभव नहीं है। जब खटीमा में आंदोलनकारियों का दमन हुआ, तो उसके विरोध में मसूरी की सड़कों पर जो जनसैलाब उतरा, उसमें किसी प्रकार का हिंसक उन्माद नहीं था।

लोग केवल लोकतंत्र में प्रदत्त अपने अधिकारों के तहत विरोध दर्ज करा रहे थे। किंतु सत्ता की गोलियों ने हंसते-खेलते चेहरों को लहूलुहान कर दिया। उस दमनकारी दौर में मसूरी ने अपनी कई संतानों को खोया, जिनमें नारी शक्ति की वे प्रतिमूर्तियां भी शामिल थीं, जिन्होंने पहाड़ के हर घर को संभाला था। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि यह शहादत कभी विस्मृत नहीं की जा सकती। इतिहास के पन्नों पर दर्ज ये बलिदान केवल अतीत की घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ये वे प्रकाशस्तंभ हैं जो हर वर्तमान और भविष्य की सरकार को उसकी जवाबदेही याद दिलाते रहते हैं। उत्तराखंड के राज्य आंदोलन का चरित्र दुनिया के कई बड़े आंदोलनों से सर्वथा भिन्न और अनुकरणीय रहा है। इस आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी इसकी अहिंसा और इसमें मातृशक्ति की स्वतःस्फूर्त भागीदारी थी। किसी भी पहाड़ी घर की रीढ़ वहां की महिलाएं होती हैं, जो खेतों की मेड़ों से लेकर जंगल की पगडंडियों तक जीवन की हर कठिनाई से रोज जूझती हैं।
जब राज्य निर्माण की हुंकार उठी, तो इन माताओं-बहनों ने चूल्हा-चौका छोड़कर सड़कों की अग्रिम पंक्ति संभाल ली। बच्चों को गोद में थामे, सर पर पारंपरिक वेशभूषा सजाए, लाठियों और गोलियों की परवाह किए बिना वे सत्ता के सामने डटकर खड़ी रहीं। मसूरी में बेलमती चौहान और हंसा धनाई जैसी वीरांगनाओं का सर्वोच्च बलिदान इस बात का अमर प्रमाण है कि देवभूमि की नारियों ने राज्य के स्वप्न को अपने खून से सींचा है। जब तक यह मातृशक्ति आंदोलन की ढाल बनकर नहीं खड़ी होती, तब तक पर्वतीय जनभावनाओं को दबाने वाली ताकतें शायद इस आंदोलन को कुचलने में सफल हो जातीं। यही कारण है कि आज की प्रशासनिक प्राथमिकताओं में मातृशक्ति का सम्मान और सुरक्षा सबसे केंद्र में दिखाई देता है। शहीदों और जीवित आंदोलनकारियों के प्रति कृतज्ञता केवल भाषणों और स्मारकों पर पुष्प अर्पित करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, क्योंकि सच्चा सम्मान नीतिगत फैसलों और कानूनी संरक्षण से ही परिलक्षित होता है। लंबे समय से उत्तराखंड के भीतर यह जनआकांक्षा थी कि जिन लोगों ने लाठियां खाईं, जेलों की यातनाएं सहीं, अपने करियर और परिवारों को दांव पर लगा दिया, उनके आश्रितों को व्यवस्था के भीतर वह स्थान मिले जिसके वे हकदार हैं। राज्य सरकार द्वारा आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों के लिए सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का कानूनी प्रावधान करना इसी दिशा में उठाया गया एक ऐतिहासिक और साहसिक कदम है। व्यवस्थाओं की संकीर्ण व्याख्याओं से परे जाकर अब इस आरक्षण की परिधि में उन आंदोलनकारियों की परित्यक्ता, विधवा और तलाकशुदा पुत्रियों को भी सम्मिलित किया गया है, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे अधिक असुरक्षित मानी जाती थीं। यह विस्तार इस बात का परिचायक है कि सरकार नियमों के कागजी दायरे से बाहर निकलकर मानवीय संवेदना और सामाजिक यथार्थ के धरातल पर निर्णय ले रही है। आरक्षण के अतिरिक्त, उन आंदोलनकारियों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना भी शासन का सर्वोपरि दायित्व बन जाता है जिन्होंने अपना यौवन संघर्षों में होम कर दिया। समय के साथ बढ़ती महंगाई और ढलती उम्र की व्याधियों को देखते हुए पेंशन ढांचे में किया गया व्यापक सुधार सीधे तौर पर उनके स्वाभिमान की रक्षा करता है। शहीद परिवारों की मासिक पेंशन को बढ़ाकर पांच हजार पांच सौ रुपये करना, जेल गए और घायल हुए आंदोलनकारियों को मिलने वाली राशि को सात हजार रुपये तक पहुंचाना, और सक्रिय आंदोलनकारियों के मानदेय को पांच हजार पांच सौ रुपये मासिक निर्धारित करना एक संवेदनशील प्रशासनिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। इससे भी अधिक मानवीय पहलू उन आंदोलनकारियों के संदर्भ में देखने को मिलता है जो गंभीर चोटों, पक्षाघात या असाध्य रोगों के चलते पूर्णतः शय्याग्रस्त हो चुके हैं। ऐसे दिव्यांग साथियों की पेंशन को बीस हजार से सीधे बढ़ाकर तीस हजार रुपये प्रतिमाह करना यह साबित करता है कि राज्य अपने उन वीरों को अंतिम सांस तक अकेला नहीं छोड़ेगा जिन्होंने उसकी नींव रखने में अपने शरीर का हर अंग झोंक दिया था।
आर्थिक सहायता के साथ-साथ आंदोलनकारियों की संतानों के भविष्य को संवारने के लिए जो शैक्षिक प्रावधान किए गए हैं, उनका प्रभाव आने वाली कई पीढ़ियों पर पड़ेगा। आंदोलनकारी परिवारों के अधिकतम दो बच्चों को स्कूल से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों और डिग्री कॉलेजों तक पूरी तरह निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराना उनके पारिवारिक बोझ को हल्का करता है। इसके साथ ही, राज्य परिवहन की बसों में आजीवन निःशुल्क यात्रा का अधिकार देना आंदोलनकारियों को सार्वजनिक जीवन में गरिमा और पहचान दिलाने का माध्यम है। यह केवल एक सुविधा नहीं है, बल्कि जब कोई आंदोलनकारी पहचान पत्र दिखाकर बस में बैठता है, तो यह समाज को उस व्यक्ति के योगदान का मौन स्मरण कराता है। पहचान पत्रों के वितरण की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाकर अब तक 98 आंदोलनकारियों को सीधे राजकीय सेवा में नियोजित किया जाना भी प्रशासनिक इच्छाशक्ति का प्रत्यक्ष उदाहरण है। किंतु राज्य केवल पुराने संघर्षों के प्रतिफल से ही जीवित नहीं रहता, उसे वर्तमान की चुनौतियों से लड़ना होता है और भविष्य के सुरक्षित आधार तलाशने होते हैं। उत्तराखंड जिन बुनियादी सवालों को लेकर अलग हुआ था, उनमें रोजगार की तलाश में युवाओं का खाली हाथ रहना और गांवों का वीरान होना सबसे बड़ी पीड़ा रही है। पिछले कुछ दशकों में राज्य ने सरकारी नौकरियों के भीतर जिस तरह के भ्रष्टाचार, पेपर लीक और भाई-भतीजावाद के काले अध्याय देखे थे, उसने आम युवा के भीतर व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास पैदा कर दिया था। उस निराशा के दौर को समाप्त करने के लिए राज्य में देश का सबसे कड़ा नकल विरोधी कानून लागू किया गया, जिसमें नकल माफिया के लिए आजीवन कारावास और संपत्ति जब्ती जैसी कठोर धाराओं का प्रावधान किया गया।

इस कठोरता का ही परिणाम है कि हाल के वर्षों में चौंतीस हजार से अधिक युवाओं को पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और योग्यता के आधार पर सरकारी सेवाओं में चयन मिला है। जब एक साधारण किसान, मजदूर या सीमांत गांव के युवक को बिना किसी सिफारिश के अपनी प्रतिभा के दम पर नियुक्ति पत्र मिलता है, तो वस्तुतः यह उस जनआंदोलन की ही जीत होती है जो समतामूलक समाज के लिए लड़ा गया था। उत्तराखंड की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां देश के अन्य मैदानी राज्यों से भिन्न हैं। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से घिरा संवेदनशील भूभाग और दूसरी तरफ सनातन संस्कृति के सर्वोच्च तीर्थ स्थलों की उपस्थिति इसे एक विशिष्ट पहचान देती है। पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार बाहरी तत्वों द्वारा डेमोग्राफिक असंतुलन पैदा करने, अवैध कब्जों को बढ़ावा देने और धार्मिक पहचान को खंडित करने के प्रयास देखे गए, उसने पर्वतीय समाज में गहरी असुरक्षा पैदा कर दी थी। इस पृष्ठभूमि में धर्मांतरण विरोधी कानून को अधिक कठोर बनाना और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से ही वसूली सुनिश्चित करने वाला दंगा विरोधी कानून लागू करना देवभूमि की मूल आत्मा की रक्षा के लिए अपरिहार्य हो चुका था। इसके साथ ही राज्य के भू-संसाधनों को अनियंत्रित खरीद-फरोख्त और माफिया तंत्र से बचाने के लिए सख्त भू-कानून की दिशा में उठाए गए कदम यह सुनिश्चित करते हैं कि यहां के मूल निवासियों का अपने संसाधनों पर अधिकार अक्षुण्ण बना रहे।
सामाजिक न्याय और समरसता के मोर्चे पर भी उत्तराखंड ने पूरे राष्ट्र के समक्ष एक नया मार्ग प्रशस्त किया है। संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में निहित समान नागरिक संहिता को लागू करने वाला देश का पहला राज्य बनना केवल एक कानूनी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह लैंगिक समानता और रूढ़िवादी भेदभाव के अंत का नया शंखनाद है। इसके माध्यम से समाज के हर वर्ग की महिलाओं को विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार में समान अधिकार सुनिश्चित किए गए हैं। इसके समानांतर, राज्य की बेटियों और बहनों को सरकारी नौकरियों में तीस प्रतिशत का क्षैतिज आरक्षण देकर प्रशासनिक ढांचे में उनकी भागीदारी को निर्णायक बनाया गया है। यह व्यवस्था सीधे तौर पर उस मातृशक्ति के ऋण को चुकाने का प्रयास है, जिसने राज्य निर्माण के दौरान ठंड, लाठियों और आंसुओं के बीच आंदोलन का परचम थामे रखा था। राज्य का विकास तब तक एकांगी माना जाएगा जब तक कि इसके दूरदराज के सीमांत जिले मुख्यधारा से भौतिक रूप से न जुड़ें। ऐतिहासिक रूप से जो गांव देश के अंतिम गांव कहे जाते थे, आज उन्हें देश के पहले गांव मानकर सीमांत विकास की कार्ययोजनाओं को धरातल पर उतारा जा रहा है। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना, आल वेदर रोड नेटवर्क, सीमांत घाटियों को जोड़ने वाले पुल और दुर्गम चोटियों को सुलभ बनाने वाले आधुनिक रोपवे तंत्र ने पर्वतीय जीवन की दूरियों को मिटा दिया है। चारधाम यात्रा, जो कभी अत्यधिक जोखिम भरी और थकाऊ मानी जाती थी, आज आधुनिक बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य सुविधाओं और सुगम परिवहन व्यवस्था से युक्त हो चुकी है।
धार्मिक पर्यटन का यह कायाकल्प केवल तीर्थयात्रियों की सुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने स्थानीय स्तर पर होमस्टे, परिवहन, खानपान और हस्तशिल्प से जुड़े लाखों नए स्वरोजगार के अवसर पैदा किए हैं। उत्तराखंड के विकास का अंतिम लक्ष्य पलायन के उस दंश को समाप्त करना है जिसने हजारों गांवों को वीरान बना दिया। युवा केवल आजीविका की तलाश में अपने पुश्तैनी घरों को छोड़कर मैदानी शहरों की झुग्गियों या तंग गलियों में गुजर-बसर करने को विवश न हों, इसके लिए स्थानीय संसाधनों पर आधारित आर्थिक मॉडल को प्रोत्साहित किया जा रहा है। कृषि, बागवानी, जड़ी-बूटी उत्पादन, स्थानीय उत्पादों की पैकेजिंग और इको-टूरिज्म के माध्यम से आर्थिकी को सीधे गांव तक पहुंचाने का प्रयास हो रहा है। जब तक हर गांव आत्मनिर्भर नहीं बनेगा और हर हाथ को काम नहीं मिलेगा, तब तक राज्य आंदोलन के शहीदों का सपना अधूरा रहेगा।
शहीद स्थल झूलाघर से दिया गया संदेश यही है कि विकास केवल कंक्रीट के ढांचों का नाम नहीं है, बल्कि यह अंतिम पंक्ति में खड़े उस साधारण व्यक्ति के जीवन में आने वाला सकारात्मक बदलाव है, जिसका बेटा कभी किसी धरने में शामिल हुआ था या जिसकी मां ने राज्य के लिए लाठियां खाई थीं। मसूरी के शहीदों का रक्त आज भी देवभूमि की नसों में स्वाभिमान का संचार कर रहा है। यह दायित्व केवल सरकार का ही नहीं, बल्कि हर नागरिक का है कि वह राज्य के प्राकृतिक संतुलन, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक गौरव को बनाए रखते हुए इसके आर्थिक विकास में अपनी भूमिका निभाए। विकल्प रहित संकल्प का अर्थ भी यही है कि अब पीछे मुड़कर देखने या संशय में रहने का समय नहीं है। शहीदों की यादों को प्रेरणा बनाकर एक ऐसे आधुनिक, आत्मनिर्भर, सुरक्षित और समृद्ध उत्तराखंड का निर्माण करना ही उनके प्रति सच्ची और स्थाई श्रद्धांजलि होगी, जहां हर नागरिक सम्मान, स्वाभिमान और समृद्धि के साथ जीवन जी सके।








