Uttarakhand House Collapse News: उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल अल्मोड़ा में प्रकृति के बदलते तेवर और जर्जर होते ढांचों ने एक ही दिन में पांच जिंदगियों को सदा के लिए खामोश कर दिया। जिले के दो अलग-अलग क्षेत्रों से आई विनाशकारी सूचनाओं ने न केवल शासन और प्रशासन को हिलाकर रख दिया, बल्कि स्थानीय जनजीवन को भी गहरे शोक में डुबो दिया है। पहाड़ पर जीवन जितना मनोरम दिखाई देता है, प्राकृतिक आपदाओं और अचानक ढहते पहाड़ों व जर्जर इमारतों के बीच वह उतना ही असुरक्षित और जोखिम भरा भी साबित होता है। अल्मोड़ा जनपद में घटी यह दोहरी त्रासदी इसी कड़वे यथार्थ को एक बार फिर रेखांकित करती है, जहां कहीं मजदूरी कर पेट पालने आए परदेसी अपनी जान गंवा बैठे, तो कहीं पीढ़ियों से बसे एक ही परिवार के तीन चिराग मलबे के नीचे हमेशा के लिए बुझ गए।
पहली हृदयविदारक घटना अल्मोड़ा के धारकीतुणी नामक स्थान के निकट सामने आई। वहां एक पुराने और जीर्ण-शीर्ण हो चुके मकान की विशालकाय दीवार अचानक भरभराकर गिर पड़ी। जिस वक्त यह हादसा हुआ, उस समय उस दीवार के समीप मौजूद दो व्यक्ति इसकी चपेट में आ गए। क्षण भर में पत्थरों, गारे और भारी मलबे के नीचे दोनों लोग पूरी तरह दब गए। आसपास मौजूद लोगों को जब तक कुछ समझ आता, तब तक धूल और मलबे के गुबार के सिवा वहां कुछ शेष नहीं बचा था। स्थानीय स्तर पर शोर मचने के बाद तत्काल राज्य आपदा प्रतिपादन बल यानी एसडीआरएफ को इस घटना की सूचना दी गई।

सूचना प्राप्त होते ही एसडीआरएफ की सरियापानी पोस्ट हरकत में आई और उपनिरीक्षक पंकज डंगवाल के नेतृत्व में एक विशेष रेस्क्यू टीम आवश्यक जीवन रक्षक उपकरणों के साथ तत्काल घटनास्थल की ओर रवाना हुई। पर्वतीय मार्गों की संकरी और विषम परिस्थितियों को पार करते हुए दल बिना किसी विलंब के मौके पर पहुंचा। घटनास्थल का दृश्य अत्यंत भयावह था, जहां भारी-भरकम पत्थरों और मिट्टी के ढेर के नीचे दबे लोगों को निकालना एक अत्यंत नाजुक और चुनौतीपूर्ण कार्य था। एसडीआरएफ के जवानों ने स्थानीय पुलिस और ग्रामीणों के सहयोग से बेहद त्वरित और सघन बचाव अभियान शुरू किया। मलबे को अत्यंत सावधानी से हटाने के बाद दोनों व्यक्तियों को बाहर निकाला गया, परंतु तब तक अत्यधिक चोटों और दम घुटने के कारण दोनों की सांसें थम चुकी थीं। प्रारंभिक जांच और दस्तावेजों के आधार पर मृतकों की पहचान नेपाली मूल के नागरिकों के रूप में हुई है, जो संभवतः क्षेत्र में आजीविका के लिए कार्यरत थे। एसडीआरएफ की टीम ने विधिक प्रक्रियाओं को पूरा करते हुए दोनों शवों को जिला पुलिस के सुपुर्द कर दिया, जिसके बाद पुलिस मृतकों की सटीक शिनाख्त और उनके परिजनों से संपर्क साधने की प्रक्रिया में जुट गई।

अभी धारकीतुणी की त्रासदी का दर्द शांत भी नहीं हुआ था कि जिले के सोमेश्वर थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम वडयूडा से एक और भीषण हादसे की खबर आ पहुंची। इस गांव में एक आवासीय मकान अचानक जमींदोज हो गया, जिसमें परिवार के कई सदस्यों के मलबे में दबे होने की गंभीर सूचना मिली। सूचना मिलते ही राहत एवं बचाव दलों को पुनः सक्रिय किया गया और टीम तेजी से सोमेश्वर के लिए रवाना हुई। हालांकि, पहाड़ की भौगोलिक विषमताओं और कुदरत की मार ने इस रेस्क्यू अभियान की राह में भी भारी अवरोध खड़े कर दिए।
घटनास्थल से लगभग तीन किलोमीटर पहले ही मुख्य मार्ग पर भारी भूस्खलन और मलबा आने के कारण सड़क पूरी तरह अवरुद्ध हो चुकी थी। किसी भी प्रकार के भारी वाहन या एंबुलेंस का आगे बढ़ पाना पूरी तरह असंभव था। ऐसी गंभीर आपात स्थिति में बिना समय गंवाए एसडीआरएफ के जवानों ने अपने अदम्य साहस और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया। जवानों ने भारी कटर, रस्सियां, प्राथमिक चिकित्सा किट और सर्चिंग टूल्स जैसे तमाम आवश्यक रेस्क्यू उपकरणों को अपने कंधों पर उठाया और तीन किलोमीटर का लंबा, पथरीला और जोखिम भरा रास्ता पैदल ही तय कर वडयूडा गांव पहुंचे।
गांव में पहुंचते ही रेस्क्यू टीम ने स्थिति का जायजा लिया और तुरंत स्थानीय नागरिकों, अग्निशमन सेवा दल तथा जिला पुलिस बल के साथ बेहतरीन समन्वय स्थापित करते हुए मलबे को हटाने का संयुक्त अभियान शुरू किया। रात के अंधेरे, संकरे रास्तों और लगातार ढहते पत्थरों के खतरे के बीच टीम ने बेहद बारीकी से खोजबीन शुरू की। मलबे की परतों को हटाने के दौरान बचाव दल ने एक के बाद एक तीन शवों को बरामद किया। यह मंजर देखकर हर किसी की आंखें नम हो गईं, क्योंकि जान गंवाने वाले सभी लोग एक ही परिवार के थे।
मृतकों की शिनाख्त प्रेमा देवी उम्र बयालीस वर्ष, उनकी उन्नीस वर्षीय पुत्री कल्पना आर्या और अठारह वर्षीय पुत्र मनीष कुमार के रूप में हुई। यह तीनों राजेंद्र राम के परिवार के सदस्य थे। एक हंसता-खेलता परिवार पलक झपकते ही काल के गाल में समा गया। अपनी युवावस्था की दहलीज पर खड़े दो बच्चों और उनकी मां की इस तरह असमय और दर्दनाक मौत ने पूरे क्षेत्र में मातम का माहौल पैदा कर दिया है।

इस भीषण त्रासदी के बीच ईश्वर की असीम कृपा से एक चमत्कारी बचाव की घटना भी सामने आई। परिवार के ही एक सदस्य गुलाब राम मकान के मुख्य हिस्से से बाहर बने एक पृथक कमरे में सो रहे थे। जब मकान का मुख्य हिस्सा ढहा, तो उसकी आवाज और कंपन सुनकर वह तुरंत सतर्क हो गए और समय रहते सुरक्षित बाहर निकलने में कामयाब रहे। इस प्रकार वह बाल-बाल बच गए, यद्यपि अपनी ही आंखों के सामने अपने परिजनों को खो देने का असहनीय आघात उन्हें अंदर तक झकझोर गया है।
पहाड़ों में लगातार हो रही मौसमी उथल-पुथल, अत्यधिक नमी और पुरानी निर्माण शैलियों के चलते ग्रामीण अंचलों में बने मकानों की संरचनात्मक क्षमता धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जाती है। अल्मोड़ा के इन दोनों हादसों ने एक बार फिर यह सोचने पर विवश कर दिया है कि किस प्रकार पर्वतीय क्षेत्रों में पुराने और कमजोर ढांचों का तकनीकी परीक्षण समय-समय पर होना अनिवार्य है। भारी बारिश और रिसाव के कारण पहाड़ों की ढलानों पर बने मकानों की नींव कमजोर हो जाती है, जिससे अचानक ऐसे हादसे जन्म लेते हैं।
जिला प्रशासन और आपदा प्रबंधन तंत्र ने इन घटनाओं के बाद क्षेत्र में सतर्कता बढ़ा दी है और संबंधित विभागों को संवेदनशील तथा जर्जर मकानों को चिह्नित करने के निर्देश दिए हैं ताकि भविष्य में इस प्रकार की जनहानि को रोका जा सके। राहत एवं बचाव एजेंसियों ने विपरीत परिस्थितियों और बंद रास्तों के बावजूद जिस तत्परता से दोनों स्थानों पर पहुंचकर कार्रवाई की, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि समय पर की गई प्रतिक्रिया आपदा के प्रभाव को नियंत्रित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अल्मोड़ा के इन दोनों हादसों ने पूरे उत्तराखंड को स्तब्ध कर दिया है और यह संदेश भी छोड़ा है कि पहाड़ पर कुदरत के साथ-साथ मानव निर्मित ढांचों की सुरक्षा पर निरंतर सजग दृष्टि रखना जीवन रक्षा के लिए अनिवार्य है।
Uttarakhand Glacier News: उत्तराखंड ग्लेशियर झील हाई अलर्ट, सैटेलाइट ड्रोन निगरानी








