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Uttarakhand Glacier News: उत्तराखंड ग्लेशियर झील हाई अलर्ट, सैटेलाइट ड्रोन निगरानी

On: August 31, 2026 3:53 AM
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Uttarakhand Glacier News: उत्तराखंड ग्लेशियर झील हाई अलर्ट, सैटेलाइट ड्रोन निगरानी
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Uttarakhand Glacier News: पड़ोसी देश नेपाल के रसुवा क्षेत्र में तिब्बत सीमा से सटी भोटे कोशी नदी में आई विनाशकारी आकस्मिक बाढ़ और उसके चलते मची व्यापक तबाही के बाद उत्तराखंड सरकार पूरी तरह चौकन्नी हो गई है। हिमालय की संवेदनशील और बेहद नाजुक भौगोलिक परिस्थितियों के बीच स्थित उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों के टूटने से पैदा होने वाले खतरों यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड को लेकर राज्य भर में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है। राज्य के आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने देहरादून में उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए हैं कि राज्य की सभी संवेदनशील ग्लेशियर झीलों, उफनती नदियों और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों की चौबीसों घंटे रियल टाइम निगरानी की जाए। सरकार ने साफ कर दिया है कि किसी भी प्राकृतिक अनहोनी से पहले मानव जीवन की रक्षा सर्वोपरि है और इसके लिए विश्व स्तर पर उपलब्ध अत्याधुनिक तकनीकों, सैटेलाइट इमेजरी, रिमोट सेंसिंग और उच्च क्षमता वाले ड्रोन कैमरों की मदद ली जाएगी।

नेपाल में हाल ही में आई आपदा ने पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। वहां ऊपरी ग्लेशियर क्षेत्र में झील फटने और भारी मलबे के साथ आए सैलाब ने दर्जनों इमारतों, मैत्री पुल और सैकड़ों लोगों को अपनी जद में ले लिया। इसी तबाही से सीधा सबक लेते हुए उत्तराखंड शासन ने राज्य के सभी पर्वतीय जिलों में तंत्र को पूरी तरह सक्रिय कर दिया है। देहरादून स्थित राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र में आयोजित बैठक में मंत्री मदन कौशिक ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हिमालयी राज्य होने के नाते उत्तराखंड प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, लेकिन समय रहते वैज्ञानिक निगरानी, सटीक पूर्वानुमान और मजबूत संचार नेटवर्क के जरिए नुकसान को न्यूनतम किया जा सकता है।

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Photo- Uttarakhand Glacier (istockphoto)

उत्तराखंड के ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में सैकड़ों छोटी-बड़ी ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं, जो तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के पानी से आकार ले रही हैं। इनमें से राज्य सरकार ने प्रारंभिक तौर पर तेरह झीलों को अत्यधिक संवेदनशील और उच्च जोखिम वाली श्रेणी में चिह्नित किया है। आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार, इनमें से चार प्रमुख झीलों का प्राथमिक वैज्ञानिक सर्वेक्षण पहले ही पूरा किया जा चुका है, जबकि बाकी नौ झीलों के विस्तृत अध्ययन की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से शुरू की जा रही है। विशेष वैज्ञानिक और तकनीकी दलों को तुरंत चमोली जिले में स्थित सरस्वती ताल और उत्तरकाशी जिले के प्रसिद्ध केदारताल के स्थलीय सर्वेक्षण के लिए रवाना करने की तैयारी है। इन वैज्ञानिक अध्ययनों का मुख्य मकसद यह जानना है कि पिछले कुछ वर्षों और मौजूदा मानसूनी मौसम के दौरान इन झीलों के जलस्तर, जलभराव क्षमता और इनके प्राकृतिक किनारों में किस प्रकार के बदलाव आए हैं।

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Photo- Uttarakhand Glacier (istockphoto)

ग्लेशियर झीलों की प्रकृति सामान्य झीलों से बहुत अलग होती है। ये झीलें किसी पक्के कंक्रीट के बांध से नहीं, बल्कि बर्फ, ढीली मिट्टी, पत्थरों और बोल्डरों के अस्थिर मलबे यानी मोरेन से घिरी होती हैं। जब पहाड़ों में अत्यधिक बारिश होती है, बादल फटते हैं या ऊपर से कोई बड़ा हिमखंड टूटकर झील में गिरता है, तो पानी का दबाव इन कमजोर प्राकृतिक बांधों को एक ही झटके में तोड़ देता है। इसके बाद लाखों क्यूबिक मीटर पानी विशालकाय पत्थरों और गाद के साथ भयानक गति से नीचे की घाटियों की ओर दौड़ता है, जिसे संभलने का कोई समय नहीं मिलता। वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा और 2021 में चमोली के ऋषिगंगा में आई तबाही इसी तरह के प्राकृतिक विस्फोटों की भयावह मिसाल रही हैं।

यही वजह है कि सरकार अब केवल पुराने ढर्रे पर निर्भर रहने के बजाय पूरी तरह आधुनिक डिजिटल और तकनीकी निगरानी प्रणाली को जमीन पर उतार रही है। मंत्री मदन कौशिक ने तकनीकी एजेंसियों और इसरो सहित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और केंद्रीय जल आयोग जैसी विशेषज्ञ संस्थाओं के साथ तत्काल तालमेल बैठाने के निर्देश दिए हैं। निर्देश दिए गए हैं कि सैटेलाइट इमेजरी के जरिए हर हफ्ते झीलों के फैलाव और आकार का डेटा तैयार किया जाए। इसके साथ ही उन दुर्गम घाटियों में जहां इंसानी पहुंच बेहद कठिन है, लंबी दूरी तक उड़ान भरने वाले सर्विलांस ड्रोन तैनात किए जाएंगे। ये ड्रोन झीलों की परिधि, जलस्तर में असामान्य वृद्धि और आसपास की ढलानों पर होने वाले नए भूस्खलन की तस्वीरें और वीडियो सीधे कंट्रोल रूम को भेजेंगे।

तकनीकी निगरानी के साथ-साथ अर्ली वॉर्निंग सिस्टम यानी पूर्व चेतावनी तंत्र को सबसे अहम कड़ी माना गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विजन के अनुरूप, संवेदनशील झीलों के मुहाने पर अत्याधुनिक ऑटोमैटिक वॉटर लेवल सेंसर और मौसम स्टेशन स्थापित किए जाएंगे। यदि किसी भी झील में जलस्तर अचानक सामान्य सीमा से ऊपर उठता है या किनारे में कोई दरार दिखाई देती है, तो ये सेंसर बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के तुरंत राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र और जिला आपदा प्रबंधन कार्यालयों को आपात संदेश भेज देंगे। इसके साथ ही नदी घाटियों के निचले रिहायशी इलाकों में हाई-डेसिबल सायरन और ऑटोमेटेड लाउडस्पीकर सिस्टम लगाए जा रहे हैं ताकि खतरा पैदा होते ही सायरन बज उठे और स्थानीय आबादी को सुरक्षित स्थानों की ओर भागने के लिए कम से कम तीस से पैंतालीस मिनट का जीवनरक्षक समय मिल सके।

आपदा प्रबंधन मंत्री ने मानसून के मौजूदा मिजाज को देखते हुए सभी जिलाधिकारियों और संबंधित रेखीय विभागों को चौबीसों घंटे बिना किसी ढिलाई के अलर्ट मोड में रहने का आदेश दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य में लगातार हो रही बारिश के चलते सभी प्रमुख नदियों जैसे अलकनंदा, भागीरथी, मंदाकिनी, पिंडर, काली और शारदा के जलस्तर की राउंड-द-क्लॉक मॉनिटरिंग की जाए। जब भी किसी बांध या बैराज से अतिरिक्त पानी छोड़ा जाए, तो निचले तटवर्ती इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों, तीर्थयात्रियों और पड़ोसी मैदानी राज्यों को काफी पहले से सूचित किया जाए ताकि किसी प्रकार की जनहानि न हो।

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Photo- Uttarakhand Glacier (istockphoto)

बैठक में यात्रा प्रबंधन और राजमार्गों की सुरक्षा पर भी कड़ा रुख अपनाया गया। मंत्री ने निर्देश दिए कि चारधाम यात्रा और अन्य पर्वतीय मार्गों पर वाहनों का संचालन मौसम की सटीक और वास्तविक रिपोर्ट के आधार पर ही किया जाए। खराब मौसम, भारी वर्षा या भूस्खलन की आशंका वाले दिनों में यात्रियों को सुरक्षित ठहराव स्थलों पर ही रोक लिया जाए और उनके खान-पान तथा बुनियादी सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा जाए। स्थिति सामान्य होने पर ही आगे की यात्रा की अनुमति दी जाए। लोक निर्माण विभाग और बीआरओ को निर्देश दिए गए हैं कि लैंडस्लाइड संभावित संवेदनशील मोड़ों पर भारी जेसीबी, पोकलैंड मशीनें और तकनीकी टीमें चौबीस घंटे तैनात रहें, ताकि सड़क बंद होते ही उसे कुछ ही घंटों में दोबारा यातायात के लिए खोला जा सके।

संचार व्यवस्था को आपदा की सबसे बड़ी रीढ़ बताते हुए मदन कौशिक ने वैकल्पिक संचार प्रणालियों को तुरंत चाक-चौबंद करने के निर्देश दिए। अक्सर भारी मानसूनी बारिश और भूस्खलन के चलते पहाड़ों में मोबाइल टावर ठप हो जाते हैं और ऑप्टिकल फाइबर केबल कट जाती है, जिससे पूरा इलाका बाकी दुनिया से कट जाता है। मंत्री ने कहा कि ऐसे संवेदनशील और दूरदराज के सीमांत क्षेत्रों में सैटेलाइट फोन, वायरलेस नेटवर्क और क्यू-डाक जैसी आधुनिक आपातकालीन संचार प्रणालियों को तुरंत एक्टिव रखा जाए, ताकि किसी भी विपरीत परिस्थिति में राहत और बचाव कार्यों में कोई रुकावट न आए।

नेपाल सीमा से सटे कुमाऊं मंडल के चंपावत, पिथौरागढ़ और उधमसिंह नगर जिलों में भी विशेष चौकसी बरती जा रही है। चंपावत जिला प्रशासन को बनबसा और टनकपुर के पास काली और शारदा नदी के जलस्तर पर पैनी नजर रखने को कहा गया है। शारदा बैराज के सभी गेटों, स्नान घाटों और सीमावर्ती नदी क्षेत्रों में एसडीआरएफ, जल पुलिस और स्थानीय पुलिस बल को मुस्तैद कर दिया गया है। सीमा पार से आने वाले किसी भी अचानक बहाव को भांपने के लिए सीमा सुरक्षा बलों के साथ निरंतर समन्वय रखा जा रहा है।

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Photo- Uttarakhand Glacier (istockphoto)

उत्तराखंड सरकार का यह चौतरफा कदम केंद्र सरकार की राष्ट्रीय जीएलओएफ जोखिम न्यूनीकरण परियोजना के साथ पूरी तरह तालमेल में है, जिसे हिमालयी राज्यों के संरक्षण के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है। प्रकृति के मिजाज को बदला नहीं जा सकता, लेकिन आधुनिक तकनीक, विज्ञान, प्रशासनिक तत्परता और जन-जागरूकता के मेल से उसके विनाशकारी प्रभाव को निश्चित रूप से थामा जा सकता है। धामी सरकार की यह 24×7 निगरानी रणनीति देवभूमि के निवासियों, सीमांत प्रहरियों और देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के सुरक्षित भविष्य के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सामयिक ढाल साबित होगी।

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