Uttarakhand News: उत्तराखंड केवल अपनी सुरम्य वादियों, हिमाच्छादित शिखरों और पावन तीर्थस्थलों के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यह वीर प्रसूता भूमि है जिसका हर दूसरा परिवार राष्ट्र रक्षा के संकल्प से जुड़ा हुआ है। कारगिल की दुर्गम चोटियों से लेकर सियाचिन के बर्फीले मोर्चों और देश की सीमाओं के हर कोने पर उत्तराखंड के जांबाज सैनिकों ने अपने अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान की गाथाएं लिखी हैं। इस शौर्य गाथा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए राज्य की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने सैनिक कल्याण को केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि अपना सर्वोच्च कर्तव्य माना है।
सरकार की दूरदर्शी और संवेदनशील नीतियों का ही परिणाम है कि आज उत्तराखंड सैनिक कल्याण और पुनर्वास के क्षेत्र में पूरे देश के लिए एक अनुकरणीय मॉडल बनकर उभरा है। सैनिकों, पूर्व सैनिकों, वीरांगनाओं और बलिदानी परिवारों के जीवन को सुरक्षित, सम्मानित और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने जो ठोस कदम उठाए हैं, वे आज राष्ट्रीय स्तर पर नीति-निर्माताओं के लिए अध्ययन का विषय बन चुके हैं। अग्निवीरों के भविष्य को संबल: देश का पहला अनूठा रोजगार सेल भारतीय सेना में अल्पावधि सेवा के पश्चात अपने नागरिक जीवन में लौटने वाले अग्निवीरों के भविष्य को लेकर पूरे देश में विभिन्न चर्चाएं रही हैं, परंतु उत्तराखंड ने इन चर्चाओं से आगे बढ़कर एक व्यावहारिक और ऐतिहासिक समाधान प्रस्तुत किया है। हाल ही में राज्य कैबिनेट द्वारा मंजूर किया गया अग्निवीर रोजगार सेल इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन चुका है जिसने सेना में चार वर्ष की सेवा पूर्ण कर लौटने वाले युवाओं के लिए एक समर्पित रोजगार सेल का गठन किया है। यह सेल न केवल अग्निवीरों के कौशल, अनुभव और अनुशासन का सदुपयोग करने के लिए रोजगार के नए अवसर तलाशेगा, बल्कि उन्हें उपयुक्त निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों में समायोजित करने का एक मजबूत माध्यम भी बनेगा। इसके साथ ही राज्य सरकार ने पूर्व में ही सरकारी सेवाओं में अग्निवीरों को दस प्रतिशत का क्षैतिज आरक्षण देने का ऐतिहासिक निर्णय लेकर यह स्पष्ट कर दिया था कि राष्ट्र की रक्षा करने वाले युवाओं के भविष्य की चिंता राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।
बलिदानियों की स्मृति को अमर करने की ग्राम्य पहल राष्ट्र की संप्रभुता के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर सपूतों का सम्मान केवल बड़े स्मारकों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उनकी स्मृति उनके अपने पैतृक गांव और समाज के कण-कण में रची-बसी होनी चाहिए। इसी पावन विचार को धरातल पर उतारते हुए धामी सरकार ने कैबिनेट बैठक में यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया है कि प्रदेश के सभी बलिदानियों की आदमकद प्रतिमाएं उनके अपने पैतृक गांवों में स्थापित की जाएंगी। यह पहल न केवल बलिदानी परिवारों के प्रति समाज और सरकार के अगाध सम्मान को दर्शाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भीतर भी देशप्रेम, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा की लौ को प्रज्वलित रखने का काम करेगी।
जब कोई युवा अपने ही गांव की चौपाल पर अपने ही माटी के वीर सपूत की प्रतिमा देखेगा, तो उसमें भी राष्ट्रसेवा का वही पावन जज्बा अंकुरित होगा। अनुग्रह राशि और वीरता पुरस्कारों में अभूतपूर्व वृद्धि सैनिक परिवारों की आर्थिक सुरक्षा और उनके स्वाभिमान को बनाए रखने के लिए धामी सरकार ने अनुग्रह राशि के ढांचे में आमूलचूल और अभूतपूर्व परिवर्तन किया है। देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से अलंकृत होने वाले जांबाजों के परिवारों को दी जाने वाली अनुग्रह राशि को डेढ़ करोड़ रुपये से बढ़ाकर सीधे दो करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसी प्रकार अन्य सभी बलिदानी सैनिकों के आश्रितों को दी जाने वाली सहायता राशि में पांच गुना की भारी वृद्धि करते हुए इसे दस लाख रुपये से बढ़ाकर पचास लाख रुपये किया गया है। इतना ही नहीं, विभिन्न श्रेणियों के वीरता पुरस्कारों से सम्मानित होने वाले सैनिकों को प्रदान की जाने वाली एकमुश्त राशि और वार्षिक भत्तों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी की गई है।
यह कदम दर्शाता है कि सरकार सैनिकों के बलिदान का मूल्यांकन कागजी औपचारिकताओं में नहीं, बल्कि ठोस और सम्मानजनक आर्थिक सुरक्षा के रूप में करती है। पांचवें धाम के रूप में आकार लेता भव्य सैन्य धाम उत्तराखंड के चार धामों की आध्यात्मिक महत्ता के समान ही सैनिकों के त्याग और शौर्य को समर्पित एक नया तीर्थ स्थल देहरादून के गुनियाल गांव में पूरी भव्यता के साथ बनकर तैयार हो चुका है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का यह ड्रीम प्रोजेक्ट अब अपने लोकार्पण की दहलीज पर है। इस सैन्य धाम की सबसे भावुक और विशिष्ट बात यह है कि इसके निर्माण के लिए उत्तराखंड के प्रत्येक बलिदानी सैनिक के घर-आंगन की पवित्र मिट्टी को पूरे सैन्य सम्मान और आत्मीयता के साथ एकत्र करके यहां लाया गया है।
सैन्य धाम की दीवारों पर उकेरी गई शौर्य गाथाएं यहां आने वाले हर नागरिक और श्रद्धालु को इस बात का अहसास कराएंगी कि जिस स्वतंत्र और सुरक्षित भारत में हम सांस ले रहे हैं, उसकी नींव में उत्तराखंड के अनगिनत वीर सपूतों का रक्त और पसीना समाया हुआ है। यह धाम केवल ईंट-पत्थर की संरचना नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति की एक जीवंत पाठशाला है। बलिदानी आश्रितों को सरकारी नौकरी और नियमों का सरलीकरण सैनिक की शहादत के बाद उसके परिवार को संबल देना और उनके जीवन को पुनः पटरी पर लाना किसी भी संवेदनशील सरकार का प्राथमिक कर्तव्य होता है। धामी सरकार ने अपने संकल्प को निभाते हुए अब तक प्रदेश के अट्ठाईस बलिदानी सैनिकों के आश्रितों को विभिन्न सरकारी सेवाओं में सम्मानजनक पदों पर समायोजित कर दिया है। सरकार ने इस प्रक्रिया में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों को समझते हुए नियमों में भी अत्यंत संवेदनशील बदलाव किए हैं।
पूर्व में जहां बलिदानी के आश्रित को अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए आवेदन करने की समय सीमा केवल दो वर्ष निर्धारित थी, उसे बढ़ाकर अब पांच वर्ष कर दिया गया है। इस निर्णय से उन परिवारों को विशेष राहत मिली है जिनके बच्चे शहादत के समय छोटे थे या जो किसी पारिवारिक संकट के कारण समय पर आवेदन नहीं कर पाए थे। संपत्ति खरीद में स्टाम्प छूट और विधिक सुरक्षा का सुरक्षा कवच सैनिकों और पूर्व सैनिकों की जमीनी समस्याओं के समाधान के लिए भी राज्य सरकार ने कई सराहनीय और व्यावहारिक निर्णय लिए हैं। सेवारत सैनिकों और पूर्व सैनिकों को पच्चीस लाख रुपये तक की अचल संपत्ति खरीदने पर स्टाम्प शुल्क में पच्चीस प्रतिशत की सीधी छूट प्रदान की जा रही है, जिससे उनके अपने घर का सपना साकार करने में बड़ी आर्थिक मदद मिल रही है। इसके अलावा लंबे समय से यह देखा गया था कि सीमा पर तैनात रहने के कारण कई बार सैनिकों या उनके परिवारों को भूमि विवादों और धोखाधड़ी का सामना करना पड़ता था, और वे अदालतों के चक्कर काटने को विवश होते थे।
इस पीड़ा को समझते हुए धामी सरकार ने जिला अदालतों और प्रशासनिक स्तर पर ऐसे मामलों की त्वरित निगरानी और निस्तारण के लिए विशेष व्यवस्था की है, ताकि देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले जांबाज को अपनी ही जमीन की सुरक्षा के लिए दर-दर न भटकना पड़े। सैनिक सम्मान से राष्ट्र निर्माण का नया अध्याय उत्तराखंड सरकार द्वारा सैनिक कल्याण के क्षेत्र में उठाए गए ये तमाम कदम केवल सरकारी योजनाओं का पुलिंदा नहीं हैं, बल्कि यह उस अटूट विश्वास का प्रकटीकरण हैं जो एक सैनिक अपनी सरकार और समाज पर रखता है। जब एक जवान सीमा पर तैनात होकर गोलियों का सामना करता है, तो उसके मन में यह पूर्ण विश्वास होना चाहिए कि उसके पीछे उसका राज्य और उसकी सरकार उसके परिवार की ढाल बनकर खड़ी है। पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड ने इस विश्वास को पूरी निष्ठा के साथ सिद्ध करके दिखाया है। यह समग्र और संवेदनशील सैनिक कल्याण मॉडल देश के अन्य राज्यों को भी यह संदेश देता है कि सैनिकों के प्रति कृतज्ञता केवल नारों में नहीं, बल्कि ठोस नीतियों, सम्मानजनक आर्थिक संबल और स्थायी पुनर्वास के माध्यम से ही व्यक्त की जानी चाहिए।
Uttarakhand News: मॉडल बना धामी सरकार का “सैनिक कल्याण”, अग्निवीर रोजगार सेल का गठन करने वाला देश का पहला राज्य
By MDANO Editor
On: August 28, 2026 12:24 PM

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