Uttarakhand Congress Rakhi: गुरुवार को रक्षाबंधन का पर्व भारतीय जनमानस में केवल भाई और बहन के पारस्परिक स्नेह, आत्मीयता और उपहारों के आदान-प्रदान का अवसर नहीं है, बल्कि यह मूल रूप से नारी गरिमा, सुरक्षा और उसके अधिकारों की रक्षा के अटूट संकल्प का प्रतीक माना जाता है। सावन की पूर्णिमा जब पूरे देश में रेशमी धागों की मिठास और खुशियों का उल्लास लेकर आती है, तब उसी पावन बेला पर गुरुवार को उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की सड़कों पर एक अत्यंत मार्मिक और विचारणीय दृश्य देखने को मिला। प्रदेश की मातृशक्ति अपने हाथों में केवल पारंपरिक राखियां लेकर नहीं निकली थी, बल्कि उन रेशमी धागों में अंकिता भंडारी सहित देवभूमि की उन तमाम अभागी बेटियों की सिसकियां, दर्द और अनसुलझे न्याय के सवाल पिरोए गए थे, जिनकी आवाजें वक्त की धुंध और प्रशासनिक उदासीनता के नीचे दबा दी गई हैं। गुरुवार को उत्तराखंड महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष ज्योति रौतेला के नेतृत्व में धर्मपुर विधानसभा और राज्य के कोने-कोने से जुटी महिलाओं का यह जमावड़ा व्यवस्था की अंतरात्मा को झकझोरने का एक साहसिक और भावनात्मक प्रयास था।

बैरिकेड्स के पहरे में दबी बहनों की पुकार
गुरुवार को उत्तराखंड प्रदेश महिला कांग्रेस की बहनों और 18 धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र से भारी संख्या में पहुंची मातृशक्ति ने जब मुख्यमंत्री आवास की ओर कदम बढ़ाए, तो उनका उद्देश्य किसी उत्सव की औपचारिकता निभाना नहीं, बल्कि प्रदेश के मुखिया को उनके संवैधानिक और नैतिक दायित्वों का स्मरण कराना था। महिलाएं अपने साथ पारंपरिक थाली सजाकर लाई थीं, जिसमें रोली, अक्षत, मौली, धूप, दीप और मिठास के साथ-साथ उन पीड़ित बेटियों के नाम की राखियां थीं जो आज इस दुनिया में अपनी रक्षा की गुहार लगाने के लिए जीवित नहीं हैं। परंतु विडंबना यह रही कि सत्ता के गलियारों तक पहुंचने से पहले ही भारी पुलिस बल ने लोहे की बैरिकेडिंग खड़ी करके बहनों के इस काफिले को रोक दिया। यह दृश्य अपने आप में कई गहरे सवाल खड़े करता है कि जब एक बहन अपने राज्य के मुखिया से अपने बुनियादी सम्मान और न्याय की बात करने पहुंचती है, तो सत्ता का पहला प्रत्युत्तर संवाद के बजाय लोहे की दीवारें और पुलिस का पहरा क्यों बन जाता है।

गीत के आंसुओं में ढला बेटियों का दर्द
जब सत्ता के दरवाजे बंद मिले और पैरों की गति को बैरिकेड्स ने थाम दिया, तो महिलाओं ने अपने प्रतिरोध को एक बेहद मर्मस्पर्शी और सांस्कृतिक रूप दिया। सड़क पर बैठकर मातृशक्ति ने गीतों और भजनों के माध्यम से मुख्यमंत्री और पूरी सरकार की संवेदनाओं को जगाने की पुरजोर कोशिश की। उस गीत के हर एक बोल में उस अंकिता भंडारी का दर्द गूंज रहा था जिसने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। उन सुरों में ‘नन्ही परी’ और उत्तराखंड की उन तमाम मासूम बच्चियों, युवतियों और बहनों की पीड़ा समाहित थी जो बलात्कार, नृशंस हत्या और बर्बर अत्याचारों की शिकार होकर न्याय प्रणाली की चौखट पर वर्षों से इंतजार कर रही हैं। गीत के मार्मिक सुर जैसे ही वातावरण में गूंजे, वहां मौजूद प्रदेश अध्यक्ष ज्योति रौतेला सहित दर्जनों महिलाओं की आंखें छलक पड़ीं। वे आंसू केवल शोक के नहीं थे, बल्कि उस असहायता और गुस्से का मिश्रण थे जो एक मां, एक बहन और एक संवेदनशील नागरिक अपने आसपास हो रहे अन्यायों को देखकर महसूस करता है।

अंकिता भंडारी का अधूरा न्याय और वीआईपी का अनुत्तरित प्रश्न
उत्तराखंड की शांत वादियों में घटी अंकिता भंडारी हत्याकांड की घटना ने पूरे देश की चेतना को हिलाकर रख दिया था। एक साधारण परिवार की मेहनती बेटी जिसने अपने आत्मसम्मान का सौदा करने से इनकार कर दिया, उसे नहर की ठंडी लहरों में फेंक दिया गया। वर्षों बीत जाने के बावजूद जनता के मन में आज भी यह सवाल जस का तस खड़ा है कि उस पूरे षड्यंत्र में जिस ‘कथित वीआईपी’ का नाम बार-बार फुसफुसाहटों में सामने आया, उसकी वास्तविक पहचान और भूमिका को अब तक पूरी तरह सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया। मुख्यमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन कर रही महिलाओं ने इसी अनुत्तरित प्रश्न को राखी के धागे से बांधकर सरकार के सामने रखा। ज्योति रौतेला ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अंकिता की यह राखी सरकार से पूछ रही है कि केंद्रीय जांच एजेंसी की प्रगति रिपोर्ट जनता के सामने कब आएगी और क्या सत्ता के रसूखदारों के नाम फाइलों के नीचे दबा दिए जाएंगे।
प्रतिरोध की राजनीति नहीं, निष्पक्ष न्याय की आकांक्षा
गुरुवार को महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष ज्योति रौतेला ने इस दौरान मीडिया और उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए यह भी साफ किया कि उनका यह आंदोलन किसी निर्दोष को राजनीतिक द्वेष के तहत कटघरे में खड़ा करने का प्रयास नहीं है। उन्होंने कहा कि उनका संघर्ष केवल और केवल कानून के राज, निष्पक्षता और पारदर्शी जांच की बहाली के लिए है। यदि जांच एजेंसियां स्वतंत्र और निष्पक्ष होकर काम करेंगी, तो जो भी सच सामने आएगा, उसे पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रदेश की जनता के सम्मुख सार्वजनिक किया जाना चाहिए। जब तक जांच में पारदर्शिता नहीं होगी और मुख्य षड्यंत्रकारियों को कानून के अनुसार कठोरतम सजा नहीं मिलेगी, तब तक देवभूमि की मातृशक्ति शांत बैठने वाली नहीं है। यह संकल्प केवल अंकिता के लिए नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के हर उस मां-बाप के लिए है जो अपनी बेटियों को बेहतर भविष्य के सपने दिखाकर बाहर भेजते हैं।

प्रशासन को ज्ञापन और फास्ट ट्रैक न्याय प्रणाली की मांग
मुख्यमंत्री से सीधे मुलाकात न हो पाने और लंबे इंतजार के बाद महिलाओं ने अपनी मांगों से संबंधित एक विस्तृत ज्ञापन प्रशासन के अधिकृत प्रतिनिधि को सौंपा। इस ज्ञापन में केवल अंकिता भंडारी हत्याकांड की वर्तमान स्थिति पर ही बात नहीं की गई, बल्कि पूरे प्रदेश में लगातार बढ़ रहे महिला एवं बाल अपराधों पर एक गंभीर चिंता व्यक्त की गई। ज्ञापन के माध्यम से मांग की गई कि महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध होने वाले गंभीर अपराधों, दुष्कर्म और हत्या के मामलों में समयबद्ध जांच की व्यवस्था की जाए। ऐसे संवेदनशील मामलों के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन कर त्वरित सुनवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि पीड़ित परिवारों को न्याय की आस में अपनी पूरी जिंदगी अदालतों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते हुए न गंवानी पड़े। इसके अतिरिक्त महिला अपराधों की निरंतर निगरानी के लिए एक प्रभावी और जवाबदेह प्रशासनिक व्यवस्था खड़ी करने की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई।
संवेदना, सुरक्षा और सत्ता की जवाबदेही का पर्व
रक्षाबंधन का यह अनूठा प्रदर्शन समाज और शासन दोनों को यह स्मरण कराता है कि उत्सवों की सार्थकता केवल औपचारिक बधाइयों और विज्ञापनों में नहीं है। एक सभ्य समाज की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वह अपनी सबसे कमजोर और असहाय बेटी को कितनी सुरक्षा और सम्मान दे पाता है। ज्योति रौतेला ने कहा कि जब पहाड़ की कोई बेटी अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करती है, तो उसकी आवाज पूरे प्रदेश की साझी आवाज बन जाती है। आज जो राखी मुख्यमंत्री को भेंट करने का प्रयास किया गया, वह केवल धागे का एक टुकड़ा नहीं थी, बल्कि वह प्रदेश की लाखों बहनों की ओर से दिया गया एक खुला संदेश थी कि नारी शक्ति अब अन्याय, प्रशासनिक शिथिलता और लीपापोती को मूकदर्शक बनकर स्वीकार नहीं करेगी। जब तक देवभूमि का कोना-कोना हर बेटी के लिए भयमुक्त और सुरक्षित नहीं बन जाता, तब तक रक्षा का यह पावन संकल्प हर सड़क और हर मंच पर इसी तरह गूंजता रहेगा।
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