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Sonam Wangchuk Hunger Strike News: सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल, फिर हुई कार्रवाई, जानिए क्या है पूरा मामला

On: July 18, 2026 3:41 PM
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Sonam Wangchuk Hunger Strike News: सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल, फिर हुई कार्रवाई, जानिए क्या है पूरा मामला
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Sonam Wangchuk Abhijeet Dipke Hunger Strike News: दिल्ली के ऐतिहासिक धरना स्थल जंतर-मंतर पर पिछले तीन सप्ताह से जारी एक शांत लेकिन बेहद शक्तिशाली आंदोलन में शनिवार सुबह एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया। लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा और पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर पिछले 21 दिनों से लगातार आमरण अनशन (भूख हड़ताल) पर बैठे प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ने के बाद दिल्ली पुलिस उन्हें सुबह-सुबह जबरन उठाकर सफदरजंग अस्पताल ले गई। वांगचुक और उनके समर्थकों का यह आंदोलन लद्दाख की नाजुक पारिस्थितिकी और वहां के जनजातीय समुदाय के भविष्य को बचाने की एक बड़ी कवायद है। 21 दिनों के इस कड़े उपवास के कारण उनके शरीर के कई महत्वपूर्ण मानकों में गिरावट देखी जा रही थी, जिसके बाद प्रशासन ने यह निवारक और सुधारात्मक कदम उठाया।

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photo- Sonam Wangchuk Hunger Strike

इस घटना के बाद एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि आखिर लद्दाख के लोग केंद्र सरकार से इतने नाराज क्यों हैं और सोनम वांगचुक जैसी वैश्विक हस्ती को कड़कड़ाती ठंड और विपरीत परिस्थितियों के बीच दिल्ली की सड़कों पर अनशन करने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा। यह मामला केवल एक व्यक्ति के उपवास का नहीं है, बल्कि यह सीमांत क्षेत्र लद्दाख के लाखों लोगों की क्षेत्रीय पहचान, स्वायत्तता और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की सामूहिक पुकार है।

क्या है पूरा मामला और क्यों जंतर-मंतर पहुंचे सोनम वांगचुक

इस पूरे विवाद की जड़ें साल 2019 में हुए ऐतिहासिक संवैधानिक बदलावों से जुड़ी हैं। अगस्त 2019 में जब केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किया, तो उसके साथ ही लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग करके एक केंद्र शासित प्रदेश (Union Territory) बना दिया गया। शुरुआती दौर में लद्दाख के लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया था क्योंकि उनकी लंबे समय से मांग थी कि उन्हें कश्मीर के प्रशासनिक नियंत्रण से मुक्ति मिले। लेकिन समय बीतने के साथ ही स्थानीय लोगों की उम्मीदें निराशा में बदलने लगीं। लद्दाख के लोगों को अहसास हुआ कि केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद उनके पास अपनी कोई चुनी हुई विधानसभा नहीं है और पूरा शासन तंत्र नौकरशाही (ब्यूरोक्रेसी) के जरिए चलाया जा रहा है।


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स्थानीय समुदायों को यह डर सताने लगा कि लद्दाख की जमीन, जो कि सामरिक और पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील है, उस पर बाहरी उद्योगपतियों और खनन कंपनियों का कब्जा हो जाएगा। लद्दाख की लगभग 97 प्रतिशत आबादी जनजातीय है। ऐसी स्थिति में अपनी संस्कृति, भाषा और जमीन को बचाने के लिए लेह और कारगिल के लोगों ने हाथ मिलाया और दो प्रमुख संगठनों—लेह अपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (KDA)—का गठन किया। इन्हीं संगठनों के बैनर तले सोनम वांगचुक ने लद्दाख से दिल्ली तक की पैदल यात्रा की और अंततः जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल शुरू कर दी।

आंदोलन की चार मुख्य मांगें जो केंद्र सरकार के सामने चुनौती हैं

सोनम वांगचुक और लद्दाख के प्रदर्शनकारियों की मांगें बेहद स्पष्ट और संवैधानिक दायरे के भीतर हैं। वे किसी नए कानून की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि भारतीय संविधान में पहले से मौजूद प्रावधानों को लद्दाख पर लागू करने की वकालत कर रहे हैं। इस आंदोलन की चार प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:

  • लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा: प्रदर्शनकारियों की पहली मांग है कि लद्दाख को केवल एक केंद्र शासित प्रदेश बनाकर न रखा जाए, बल्कि उसे एक पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए ताकि वहां की जनता लोकतांत्रिक तरीके से अपनी सरकार चुन सके और अपनी नीतियां खुद बना सके।
  • संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करना: यह इस आंदोलन की सबसे बड़ी और मुख्य मांग है। भारतीय संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) पूर्वोत्तर के कुछ जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्त जिला परिषदों (Autonomous District Councils) के गठन का अधिकार देती है। इन परिषदों के पास भूमि, जंगल, जल और स्थानीय संस्कृति के संरक्षण के लिए कानून बनाने की शक्ति होती है। लद्दाख के लोग भी इसी तरह का संरक्षण चाहते हैं।
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photo- Sonam Wangchuk Hunger Strike
  • नौकरियों में स्थानीय युवाओं को आरक्षण: केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद लद्दाख के युवाओं में बेरोजगारी को लेकर भारी असंतोष है। उनकी मांग है कि लद्दाख की सरकारी नौकरियों में केवल स्थानीय मूल निवासियों को ही प्राथमिकता और आरक्षण दिया जाए ताकि बाहर के लोग उनकी नौकरियों पर कब्जा न कर सकें।
  • संसदीय प्रतिनिधित्व में बढ़ोतरी: वर्तमान में इतने बड़े भौगोलिक क्षेत्र वाले लद्दाख में केवल एक लोकसभा सीट है। आंदोलनकारियों की मांग है कि लेह और कारगिल दोनों क्षेत्रों के लिए अलग-अलग यानी कुल दो लोकसभा सीटें निर्धारित की जाएं ताकि संसद में उनकी आवाज अधिक मजबूती से गूंज सके।

शनिवार सुबह जंतर-मंतर पर क्या हुआ और पुलिस कार्रवाई की वजह

पिछले 21 दिनों से सोनम वांगचुक केवल पानी और नमक के सहारे जंतर-मंतर पर डटे हुए थे। उनके साथ लद्दाख से आए दर्जनों अन्य प्रदर्शनकारी भी बारी-बारी से उपवास पर बैठ रहे थे। जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, वांगचुक का वजन तेजी से गिर रहा था और डॉक्टरों की टीम लगातार उनके स्वास्थ्य की निगरानी कर रही थी। शनिवार की सुबह जब डॉक्टरों ने उनके स्वास्थ्य की जांच की, तो उनके ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल में खतरनाक उतार-चढ़ाव पाया गया।


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डॉक्टरों की रिपोर्ट के आधार पर कानून-व्यवस्था और किसी भी अनहोनी से बचने के लिए दिल्ली पुलिस की एक टुकड़ी भारी सुरक्षा बल के साथ जंतर-मंतर पहुंची। शुरुआत में समर्थकों ने पुलिस की इस कार्रवाई का शांतिपूर्ण विरोध किया, लेकिन स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने वांगचुक को वहां से उठाया और तुरंत नई दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले गई। अस्पताल के वीआईपी वार्ड में उन्हें भर्ती कराया गया है, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनके स्वास्थ्य को स्थिर करने और उन्हें जरूरी चिकित्सा सहायता (IV Fluids) देने की कोशिश कर रही है। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि अस्पताल में होने के बावजूद वांगचुक ने अपना उपवास तोड़ने से इनकार कर दिया है।

लद्दाख की नाजुक पारिस्थितिकी और पर्यावरण का मुद्दा

सोनम वांगचुक केवल एक राजनीतिक आंदोलनकारी नहीं हैं, वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित पर्यावरणविद् हैं जिन्होंने लद्दाख में पानी के संकट को दूर करने के लिए ‘आइस स्तूप’ (Ice Stupa) जैसी तकनीकों का आविष्कार किया है। इसलिए, उनके इस आंदोलन में पर्यावरण का मुद्दा सबसे ऊपर है। लद्दाख को “शीत मरुस्थल” (Cold Desert) कहा जाता है। यहां के ग्लेशियर पूरे उत्तर भारत की नदियों के लिए पानी का मुख्य स्रोत हैं।

वांगचुक का तर्क है कि यदि लद्दाख को छठी अनुसूची का सुरक्षा कवच नहीं मिला, तो कॉर्पोरेट कंपनियां यहां बड़े पैमाने पर खनन, होटल उद्योग और बांध परियोजनाओं की शुरुआत कर देंगी। इससे यहां के ग्लेशियर तेजी से पिघलेंगे, जिससे न केवल लद्दाख में पानी का हाहाकार मचेगा, बल्कि सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर निर्भर करोड़ों लोगों का जीवन संकट में पड़ जाएगा। उनका यह उपवास केवल लद्दाख के राजनीतिक अधिकारों के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए भी है।

कॉकरोच जनता पार्टी फाउंडर कॉकरोच जनता पार्टी फाउंडर अभिजीत दीपके ने जंतर-मंतर से एक वीडियो जारी किया है। इसमें वे कह रहे हैं – “दिल्ली पुलिस आज रात या कल सुबह हमारे विरोध-प्रदर्शन पर कार्रवाई करने की योजना बना रही है ताकि युवाओं की आवाज को दबाया जा सके। हम सभी से अनुरोध करते हैं कि वे जंतर-मंतर पर रात भर चलने वाले हमारे विरोध-प्रदर्शन में शामिल हों, ताकि हम सब मिलकर 20 तारीख को संसद तक मार्च कर सकें।”

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