हिमालय की दुर्गम चोटियों और अध्यात्म के संगम ‘आदि कैलाश’ की पवित्र यात्रा का आज से विधिवत शुभारंभ हो गया है। उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ में स्थित चीन सीमा से सटे आदि कैलाश के दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं का पहला जत्था रवाना हो चुका है। धारचूला के उपजिलाधिकारी (SDM) ने हरी झंडी दिखाकर तीर्थयात्रियों को रवाना किया, जिससे पूरे क्षेत्र में भक्तिमय माहौल बन गया है।

श्रद्धालुओं का उत्साह और पहले जत्थे की रवानगी
आज सुबह धारचूला में एक विशेष समारोह का आयोजन किया गया, जहाँ उपजिलाधिकारी ने पहले जत्थे में शामिल करीब 200 श्रद्धालुओं को तिलक लगाकर और सुरक्षा व्यवस्थाओं का जायजा लेकर रवाना किया। जैसे ही एसडीएम ने हरी झंडी दिखाई, पूरा वातावरण “हर-हर महादेव” और “जय आदि कैलाश” के नारों से गूंज उठा।

जिलाधिकारी आशीष भटगाई ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि इस वर्ष यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में अभूतपूर्व उत्साह देखा जा रहा है। उन्होंने कहा, “प्रशासन ने यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम किए हैं। पहले जत्थे की रवानगी के साथ ही इनर लाइन परमिट के लिए आवेदनों की बाढ़ आ गई है। अब तक 500 से अधिक लोग पंजीकरण करा चुके हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है।”
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ज्योलिंगकांग में खुले मंदिर के कपाट
यात्रा के शुभारंभ के साथ ही ज्योलिंगकांग स्थित भगवान शिव और माता पार्वती के प्राचीन मंदिर के कपाट भी आज खोल दिए गए। पुजारियों ने पूर्ण विधि-विधान, वैदिक मंत्रोच्चार और शंखनाद के साथ मंदिर के द्वार खोले। समुद्र तल से लगभग 14,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर के दर्शन के लिए श्रद्धालु साल भर प्रतीक्षा करते हैं। कपाट खुलने के बाद स्थानीय लोगों और पहले जत्थे के यात्रियों में खुशी की लहर है।
पीएम मोदी के दौरे के बाद ‘आदि कैलाश’ बना वैश्विक केंद्र
आदि कैलाश यात्रा के इतिहास में साल 2023 एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2023 में आदि कैलाश और गुंजी गांव का दौरा किया था। पीएम मोदी के उस दौरे के बाद से न केवल बुनियादी ढांचे (सड़कों और कनेक्टिविटी) में सुधार हुआ है, बल्कि देश-दुनिया में इस स्थल की लोकप्रियता कई गुना बढ़ गई है। पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि ‘मोदी इफेक्ट’ की वजह से ही अब यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में हर साल रिकॉर्ड बढ़ोतरी हो रही है।

यात्रा मार्ग और चुनौतियां
आदि कैलाश की यात्रा बेहद रोमांचक होने के साथ-साथ चुनौतीपूर्ण भी है। यह यात्रा धारचूला से शुरू होकर पांगला, बूंदी, गुंजी और नाभीढांग होते हुए ज्योलिंगकांग तक पहुंचती है।
- सड़क मार्ग: बीआरओ (Border Roads Organization) ने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद सड़कों को दुरुस्त किया है।
- इनर लाइन परमिट: चूंकि यह क्षेत्र चीन सीमा के करीब है, इसलिए प्रत्येक यात्री को प्रशासन से इनर लाइन परमिट लेना अनिवार्य होता है।
- प्रकृति का सान्निध्य: यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को ‘ओम पर्वत’ के भी दर्शन होते हैं, जहां बर्फ से प्राकृतिक रूप से ‘ॐ’ की आकृति बनती है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा बढ़ावा
श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या से धारचूला, गुंजी और नाभी जैसे सीमांत गांवों के होमस्टे और स्थानीय व्यापारियों के चेहरे खिले हुए हैं। सरकार द्वारा “वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम” के तहत इन क्षेत्रों में सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है, जिससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिल रहा है।









