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उत्तराखंड: हाईकोर्ट का अहम फैसला, 13 साल से जेल में बंद दोषी को किया रिहा

On: January 7, 2026 2:11 PM
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उत्तराखंड हाईकोर्ट फैसला- Uttarakhand-high-court
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उत्तराखंड हाईकोर्ट फैसला जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत एक अहम निर्णय के रूप में सामने आया है। अदालत ने हत्या और लूट के एक मामले में 13 वर्षों से जेल में बंद कैदी को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने पाया कि अपराध के समय दोषी नाबालिग था, जिसके कारण उसे दी गई आजीवन कारावास की सजा कानूनन वैध नहीं थी।

उत्तराखंड हाईकोर्ट फैसला: जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की अहम व्याख्या

गौरतलब है कि साल 2003 में रुड़की में हुई एक हत्या और लूट के प्रयास में आरोपित को सेशन कोर्ट ने दोषी ठहराया था। इस मामले में तीन आरोपियों को रुड़की के अपर जिला एवं सत्र न्यायालय की कोर्ट ने हत्या के मामले में आजीवन की सजा सुनवाई थी। इस सजा को 2013 में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने बरकरार रखा। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इसकी पुष्टि कर दी थी।

स्कूल सर्टिफिकेट से तय हुई उम्र, घटना के समय नाबालिग था अभियुक्त

अभियुक्त ने जेल से ही अपील दायर कर कहा था कि घटना के समय वह नाबालिग था। यह जानकारी 15 जून 2021 को हाईकोर्ट को जेल प्रशासन के द्वारा दी गयी। 19 अगस्त 2025 को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने उसकी आयु का पता लगाने का निर्देश रजिस्ट्रार न्यायिक को दिया। आरोपी की आयु का पता लगाने के लिए गवाहों व उसके स्कूल के सर्टिफिकेट की जांच की गई। जांच में उसकी जन्म तिथि 22 मई 1988 बताई गयी। जिसके अनुसार वारदात के समय दोषी की उम्र 15 साल एक महीने थी. सुनवाई के दौरान उसके अधिवक्ता द्वारा कोर्ट में यह दलील दी गई कि जुवेनाइल जस्टिस केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन एक्ट की धारा 7 ए के अनुसार नाबालिग होने का मामला किसी भी अदालत में किसी भी स्तर, किसी भी समय यहां तक केस के निपटारा होने के बाद भी उठाया जा सकता है। ये भी कहा कि घटना के समय अभियुक्त नाबालिग था। उसके नाबालिग होने की बात पर निचली अदालत ने सुनवाई नहीं की। वह 13 वर्षों से जेल में बंद है इसलिए उसे जल्द रिहा किया जाए। ऐसे ही कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने दोषी को छोड़ने के आदेश दिए हैं इसलिए उसको भी इसका लाभ दिया जाए।

उत्तराखंड हाईकोर्ट फैसला
Image source-highcourtofuttarakhand.gov.in

हाईकोर्ट का अहम निर्णय, नाबालिग को तीन साल से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता

कोर्ट ने माना कि आरोपी की घटना में भूमिका अन्य सह-आरोपियों के समान थी। इसलिए उसकी दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा लेकिन यह मानते हुए कि किसी नाबालिग को तीन साल से अधिक समय तक सुधार गृह में नहीं रखा जा सकता और ना ही उसे उम्रकैद जैसी सजा दी जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि आरोपित 13 साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है, इसलिए उसे तुरंत रिहा किया जाए।यह निर्णय न्यायमूर्ति रविन्द्र मैठाणी व न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की खंडपीठ ने दिया।

इस उत्तराखंड हाईकोर्ट फैसला से भविष्य के मामलों में नई दिशा मिलेगी।

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट से जुड़ी विस्तृत जानकारी भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाइट National Commission for Protection of Child Rights (https://ncpcr.gov.in/juvenile-justice-guidelines) पर उपलब्ध है।

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