न्यायमूर्ति सूर्यकांत देश के 53वें सीजेआई होंगे और 9 फरवरी, 2027 तक 15 महीने तक इस पद पर बने रहेंगे। हरियाणा के हिसार में 10 फरवरी, 1962 को जन्मे न्यायमूर्ति कांत 24 मई, 2019 को शीर्ष अदालत के न्यायाधीश बने। वह अनुच्छेद 370 को हटाने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतंत्र, भ्रष्टाचार, पर्यावरण और लैंगिक समानता पर कई ऐतिहासिक फैसले देने वाली पीठों का हिस्सा रहे हैं।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत उस ऐतिहासिक पीठ का हिस्सा थे जिसने औपनिवेशिक युग के राजद्रोह कानून को स्थगित रखा था, तथा निर्देश दिया था कि सरकार की समीक्षा तक इसके तहत कोई नई एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी।
उन्होंने चुनाव आयोग से बिहार में 65 लाख वंचित मतदाताओं का ब्यौरा सार्वजनिक करने का आग्रह किया, जिससे चुनावी पारदर्शिता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता प्रदर्शित हुई।
उन्होंने यह निर्देश देकर भी इतिहास रच दिया कि सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन सहित बार एसोसिएशनों में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी। न्यायमूर्ति सूर्यकांत उस पीठ का हिस्सा थे जिसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2022 की पंजाब यात्रा के दौरान सुरक्षा उल्लंघन की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति नियुक्त की थी। उन्होंने कहा था कि ऐसे मामलों के लिए “न्यायिक रूप से प्रशिक्षित दिमाग” की आवश्यकता होती है।
उन्होंने रक्षा बलों के लिए वन रैंक-वन पेंशन (ओआरओपी) योजना को संवैधानिक रूप से वैध बताया तथा सशस्त्र बलों में महिला अधिकारियों के लिए स्थायी कमीशन में समानता की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई जारी रखी। वह सात न्यायाधीशों की उस पीठ में थे जिसने 1967 के अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के फैसले को खारिज कर दिया था, जिससे संस्थान के अल्पसंख्यक दर्जे पर पुनर्विचार का रास्ता खुल गया था।
वह पेगासस स्पाइवेयर मामले की सुनवाई करने वाली पीठ का हिस्सा थे, जिसने गैरकानूनी निगरानी के आरोपों की जांच के लिए साइबर विशेषज्ञों का एक पैनल नियुक्त किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि राज्य को “राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में मुफ्त पास” नहीं मिल सकता है।










