Uttarakhand Latest News In Hindi: देवभूमि उत्तराखंड अपनी प्राचीन संस्कृति, लोक मान्यताओं और अटूट आस्था के लिए विश्वविख्यात है। यहाँ देवी-देवताओं का वास न केवल मंदिरों में है, बल्कि वे जनमानस के सुख-दुख के साथी भी हैं। इसी कड़ी में कुमाऊं और गढ़वाल के कई हिस्सों में एक ऐसी अनोखी परंपरा जीवित है, जहाँ देवता स्वयं डंगरियों (पश्वा) पर अवतरित होकर विवाहित बहनों को ‘भिटौली’ देने उनके घर पहुँचते हैं। चैत्र मास के इस पावन अवसर पर, जब भाई अपनी बहनों को उपहार (भिटौली) देते हैं, तब इन गाँवों में देवता स्वयं भाई का कर्तव्य निभाते हुए 22 से अधिक गाँवों का भ्रमण करते हैं।
क्या है ‘भिटौली’ और इसका महत्व?
उत्तराखंड में चैत्र का महीना ‘भिटौली’ के नाम से जाना जाता है। ‘भिटौली‘ शब्द का अर्थ है ‘भेंट’ या ‘मुलाकात’। पारंपरिक रूप से, शादीशुदा बेटियों को उनके मायके से भाई या पिता उपहार, मिठाई और पकवान देने जाते हैं। पहाड़ की लोककथाओं में भिटौली केवल एक उपहार नहीं, बल्कि मायके की याद और भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है। लेकिन जब यही जिम्मेदारी देवता अपने कंधों पर ले लें, तो यह दृश्य अलौकिक हो जाता है।

22 गाँवों की यात्रा और देवताओं का अवतरण
कुमाऊं के कुछ विशिष्ट अंचलों में यह मान्यता है कि क्षेत्र के इष्ट देव (जैसे भोलनाथ, ऐड़ी या अन्य लोक देवता) अपनी ‘मानसी बहनों’ (गाँव की बेटियाँ) को आशीर्वाद देने निकलते हैं।
1. डंगरियों पर देवताओं का आह्वान
इस अनुष्ठान की शुरुआत मंदिर के प्रांगण में जागरों के साथ होती है। ढोल-दमाऊ की थाप पर जब डंगरियों (वे व्यक्ति जिन पर देवता अवतरित होते हैं) पर देवता आते हैं, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। देवता रूपी ये डंगरी नंगे पैर ऊबड़-खाबड़ रास्तों, जंगलों और नदियों को पार करते हुए गाँवों की ओर प्रस्थान करते हैं।
2. ‘चेली-बेटी’ के घर दस्तक
मान्यता के अनुसार, देवता एक या दो नहीं, बल्कि पूरे पट्टी या इलाके के लगभग 22 गाँवों का भ्रमण करते हैं। हर उस घर में जहाँ गाँव की बेटी ब्याही गई है, देवता पहुँचते हैं। जब देवता बहन के घर पहुँचते हैं, तो बहनें अपने ‘देवता रूपी भाई’ के पैर पखारती हैं और भावुक होकर अपना दुख-सुख साझा करती हैं।
3. उपहार और आशीर्वाद का आदान-प्रदान
देवता अपने साथ अक्षत (चावल), पिठ्या (तिलक) और आशीर्वाद लेकर आते हैं। बहनें श्रद्धाभाव से उन्हें भेंट अर्पित करती हैं। यह दृश्य इतना मार्मिक होता है कि देखने वालों की आँखें नम हो जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि देवता के रूप में साक्षात भाई ही मिलने आया है।
लोक आस्था: जब देवता बनते हैं परिवार के सदस्य
उत्तराखंड की संस्कृति में ‘जागर’ के माध्यम से देवताओं को बुलाने की परंपरा सदियों पुरानी है। इस विशिष्ट भिटौली परंपरा में कुछ खास बातें इसे अन्य त्योहारों से अलग बनाती हैं:
- बिना भेदभाव का प्रेम: देवता किसी एक परिवार की बेटी नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की बेटियों को अपनी बहन मानते हैं।
- कठिन साधना: डंगरी कई दिनों तक निराहार रहकर और कठिन नियमों का पालन करते हुए इस यात्रा को संपन्न करते हैं।
- सामाजिक समरसता: इस दौरान जाति-पाति का भेद मिट जाता है और पूरा गाँव एक सूत्र में बंधकर देव-भ्रमण में शामिल होता है।
विलुप्त होती परंपराओं को बचाने की मुहिम
आज के आधुनिक युग में जहाँ पलायन ने पहाड़ों को सूना कर दिया है, वहीं ऐसी परंपराएं प्रवासियों को अपनी जड़ों की ओर खींच लाती हैं। चैत्र के महीने में दिल्ली, मुंबई और विदेशों में रहने वाले लोग भी अपनी कुलदेवी और देवताओं की इस ‘भिटौली यात्रा’ में शामिल होने गाँव पहुँचते हैं।

बुजुर्गों का कहना है कि “यह केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह उन बेटियों को यह अहसास दिलाने का तरीका है कि वे अपने ससुराल में अकेली नहीं हैं; साक्षात ईश्वर उनके रक्षक और भाई के रूप में खड़े हैं।”
चैत्र की भिटौली और लोकगीतों का दर्द
भिटौली को लेकर उत्तराखंड में कई हृदयस्पर्शी लोकगीत भी हैं। ‘ऋतु रैण’ और ‘न्यौली’ गायन में बहनें चैत्र के महीने में अपने भाई की राह तकती हैं। जब देवता खुद भिटौली लेकर आते हैं, तो इन गीतों की सार्थकता और बढ़ जाती है।
“ओ बाना चैत की भिटौली, मेरो भाई आलों होली…” (हे छोटी बहन, चैत्र की भिटौली आने वाली है, मेरा भाई जरूर आएगा…)
22 गाँवों की यह देव-यात्रा उत्तराखंड की अटूट आस्था का जीवंत प्रमाण है। विज्ञान के दौर में भी ‘डंगरियों’ का इस तरह अवतरित होना और मीलों पैदल चलकर बहनों का हाल-चाल जानना, देवभूमि की उस महान विरासत को दर्शाता है जहाँ इंसान और भगवान के बीच कोई पर्दा नहीं है। यह परंपरा सिखाती है कि रिश्ते केवल रक्त के नहीं, बल्कि आत्मा और विश्वास के होते हैं।
(For more news apart from Uttarakhand Latest News in hindi, stay tuned to Mdano News In Hindi)







