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Kumaon Holi News In Hindi: कुमाऊं में बैठ होली और खड़ी होली का अद्भुत संगम, जानें कुमाऊंनी संस्कृति के इस अनूठे रंग को

On: February 16, 2026 4:40 AM
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Kumaon Holi News In Hindi: देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा समेत पूरे कुमाऊं अंचल में खड़ी होली की धूम शुरू हो गई है। पहाड़ों में बसंत पंचमी के साथ ही होली का आगाज़ हो जाता है, लेकिन फाल्गुन मास की एकादशी (आमलकी एकादशी) के बाद कुमाऊंनी होली अपने पूरे शबाब पर होती है। यहाँ की होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि शास्त्रीय संगीत, लोक परंपरा और आपसी भाईचारे का एक जीवंत उदाहरण है।

Kumaoni Holi 2025 - The Colorful Festival of Uttarakhand

कुमाऊं में मुख्य रूप से दो प्रकार की होली मनाई जाती है— बैठ होली (Baith Holi) और खड़ी होली (Khadi Holi)। इन दोनों का संगम कुमाऊंनी समाज की रग-रग में बसा है।

बैठ होली: शास्त्रीय संगीत की सुमधुर परंपरा

कुमाऊं में होली की शुरुआत ‘बैठ होली’ से होती है। यह परंपरा पौष मास के पहले रविवार या बसंत पंचमी से शुरू हो जाती है। इसमें मोहल्ले के लोग किसी एक घर में एकत्र होते हैं और हारमोनियम व तबले की थाप पर शास्त्रीय रागों में आधारित होली गाते हैं।

  • शास्त्रीय आधार: बैठ होली में राग काफी, राग पीलू, राग झिंझोटी और राग खमाज का प्रयोग प्रमुखता से किया जाता है।
  • अध्यात्म और प्रेम: इन होलियों के गीतों में भगवान राम और कृष्ण की लीलाओं का वर्णन होता है। जैसे— “कैसी होरी मचाई री नंदलाल…” या “रघुपति खेलत होरी अयोध्या नगरी…”
  • समय का महत्व: शाम ढलते ही महफिलें सजती हैं और देर रात तक रागों का दौर चलता है। इसे ‘बैठकी’ भी कहा जाता है क्योंकि इसमें लोग बैठकर गायन का आनंद लेते हैं।
From The Mountains: All About The Unique Kumaoni Holi Celebrations

खड़ी होली: उत्साह और सामूहिकता का प्रतीक

जैसे-जैसे फाल्गुन पूर्णिमा नजदीक आती है, ‘बैठ होली’ का स्थान ‘खड़ी होली’ ले लेती है। आमलकी एकादशी (जिसे कुमाऊं में ‘चीर बंधन’ भी कहा जाता है) के बाद गाँव-गाँव में खड़ी होली शुरू हो जाती है।

  • सामूहिक नृत्य और गायन: इसमें सफेद कुर्ता-पजामा और गांधी टोपी पहने होल्यार (होली खेलने वाले) एक घेरा बनाकर खड़े होते हैं।
  • ढोल-नगाड़ों की थाप: खड़ी होली में हुड़का और ढोल मुख्य वाद्य यंत्र होते हैं। होल्यार एक साथ ताल मिलाते हुए कदम बढ़ाते हैं और सामूहिक स्वर में होली गाते हैं।
  • जोश और उमंग: खड़ी होली के गीत वीर रस और श्रृंगार रस से भरपूर होते हैं। इसमें गायन की गति तेज होती है, जो लोगों में नई ऊर्जा भर देती है।
Uttarakhand's Unique Kumaoni Holi Is Vibrant With Mock Fights, Sweet  Treats, And Musical Baithaks

चीर बंधन: होली का औपचारिक आगाज़

कुमाऊं में एकादशी के दिन मंदिरों या सार्वजनिक स्थानों पर ‘चीर’ बांधी जाती है। एक डंडे पर रंग-बिरंगे कपड़ों की कतरनें बांधी जाती हैं, जिसे ‘चीर’ कहा जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। चीर के चारों ओर घूमकर खड़ी होली गाई जाती है और इसे होलिका दहन के दिन तक सुरक्षित रखा जाता है।

कुमाऊंनी होली की अनूठी विशेषताएं

  1. आशीर्वाद (आसीस): होली के समापन पर होल्यार घर-घर जाकर गृहस्वामी को ‘आसीस’ (आशीर्वाद) देते हैं। गीत के माध्यम से मंगल कामना की जाती है— “जी लाख बरीस, तेरी ज्यूं बनी रौ सौ साल…”
  2. स्वादिष्ट पकवान: कुमाऊंनी होली बिना ‘आलू के गुटके’, ‘भांग की चटनी’, ‘गुजिया’ और ‘सिंघल’ के अधूरी है। मेहमानों का स्वागत इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों से किया जाता है।
  3. शुद्धता और मर्यादा: यहाँ की होली में फूहड़पन की कोई जगह नहीं होती। बुजुर्गों के पैरों में अबीर-गुलाल लगाकर आशीर्वाद लेना और मर्यादित गीतों का गायन इसकी पहचान है।

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आधुनिक दौर में परंपरा का संरक्षण

आज के भागदौड़ भरे समय में भी कुमाऊं के युवा अपनी इस विरासत को बचाए हुए हैं। अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और नैनीताल के गाँवों में आज भी वही पुराना उत्साह देखने को मिलता है। प्रवासी उत्तराखंडी भी होली के समय अपने गाँवों का रुख करते हैं ताकि वे अपनी जड़ों से जुड़ सकें।

निष्कर्ष: कुमाऊं की खड़ी और बैठ होली संस्कृति, संगीत और लोक कला का एक ऐसा मेल है जो दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता। यह त्योहार केवल रंगों का नहीं, बल्कि सुरों और दिलों के मिलन का उत्सव है। यदि आप देवभूमि की असली संस्कृति को महसूस करना चाहते हैं, तो एक बार कुमाऊं की होली का अनुभव जरूर करें।

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