2025 का वर्ष भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंधों के लिए उतार-चढ़ाव भरा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के बीच एक नया संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है। द्विपक्षीय व्यापार वार्ता (BTA), टैरिफ युद्ध और रूसी तेल के मुद्दे ने इस साल की आर्थिक सुर्खियों में प्रमुख स्थान बनाया है।

ट्रंप का टैरिफ प्रहार और रूसी तेल का मुद्दा
वर्ष 2025 की शुरुआत से ही राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत की व्यापार नीतियों पर कड़ा रुख अपनाया। अप्रैल 2025 में उन्होंने भारत सहित कई देशों पर ‘पारस्परिक शुल्क’ (Reciprocal Tariff) लगाने का ऐलान किया। ट्रंप का मुख्य तर्क यह रहा है कि भारत अमेरिकी सामानों पर दुनिया के सबसे ऊंचे टैरिफ लगाता है।

तनाव तब और बढ़ गया जब 1 अगस्त 2025 को अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया। इसके बाद 27 अगस्त 2025 को इसे बढ़ाकर 50% कर दिया गया। ट्रंप ने इस भारी बढ़ोतरी के पीछे भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद और सैन्य उपकरणों के आयात को मुख्य कारण बताया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो देश रूस के साथ व्यापारिक संबंध जारी रखेंगे, उन्हें अमेरिका के साथ व्यापार में दंड भुगतना होगा।
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रूसी तेल पर भारत की रणनीति: शर्तें और समझौते
भारत के लिए रूसी तेल एक व्यावहारिक और आर्थिक आवश्यकता रही है। सितंबर 2025 की रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत ने रूसी तेल का आयात कम करने के संकेत दिए हैं, लेकिन इसके बदले में अमेरिका के सामने कुछ शर्तें भी रखी हैं:
- वैकल्पिक स्रोत: भारत ने मांग की है कि यदि वह रूस से तेल कम करता है, तो अमेरिका उसे ईरान और वेनेजुएला से तेल खरीदने की छूट दे, जिन पर वर्तमान में अमेरिकी प्रतिबंध हैं।
- टैरिफ में कटौती: भारत का रुख है कि रूसी तेल आयात में कमी के साथ ही अमेरिका को ‘तेल दंड’ के रूप में लगाए गए 25% टैरिफ को तुरंत वापस लेना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों (PSUs) ने जून और सितंबर 2025 के बीच रूसी तेल के आयात में लगभग 45% की कमी की है, जो ट्रंप प्रशासन के दबाव का असर माना जा रहा है।

द्विपक्षीय व्यापार समझौता (BTA) और मोदी-ट्रंप वार्ता
इन चुनौतियों के बावजूद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच व्यक्तिगत रसायन विज्ञान ने बातचीत के दरवाजे खुले रखे हैं। हाल ही में दिसंबर 2025 में दोनों नेताओं के बीच फोन पर लंबी बातचीत हुई, जिसमें व्यापार समझौते (BTA) पर चर्चा की गई।
- BTA की स्थिति: बताया जा रहा है कि व्यापार समझौता अब अपने अंतिम चरण में है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जैमीसन ग्रीर ने इस सौदे के मसौदे को प्रारंभिक मंजूरी दे दी है।
- अमेरिका की मांग: अमेरिका चाहता है कि भारत विशेष रूप से डेयरी और कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम करे। साथ ही, अमेरिकी ऑटोमोबाइल और हार्ले-डेविडसन जैसी मोटरसाइकिलों पर शुल्क घटाने की पुरानी मांग अभी भी बरकरार है।
- भारत का पक्ष: पीएम मोदी ने स्पष्ट किया है कि भारतीय किसानों और डेयरी क्षेत्र के हितों के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। भारत एक ‘व्यापक’ और ‘न्यायसंगत’ समझौते की ओर देख रहा है, न कि जल्दबाजी में किए गए किसी मौखिक वादे की ओर।
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आर्थिक प्रभाव और भविष्य की राह
अमेरिकी टैरिफ का भारतीय निर्यात पर गहरा प्रभाव पड़ा है। मई से सितंबर 2025 के बीच अमेरिका को होने वाला निर्यात लगभग 37.5% तक गिर गया। विशेष रूप से कपड़ा, रत्न एवं आभूषण और फार्मास्युटिकल्स जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।
हालाँकि, भारत ने इसका तोड़ निकालने के लिए अन्य देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) पर तेजी से काम करना शुरू कर दिया है। हाल ही में ओमान के साथ हुआ समझौता और यूरोपीय संघ (EU) के साथ चल रही एडवांस वार्ता इसी रणनीति का हिस्सा है।
2025 के अंत तक स्थिति यह है कि भारत और अमेरिका एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ रणनीतिक साझेदारी और आर्थिक राष्ट्रवाद के बीच खींचतान जारी है। यदि व्यापार समझौता (BTA) सफलतापूर्वक संपन्न होता है, तो यह दोनों देशों के लिए ‘विन-विन’ स्थिति होगी। लेकिन इसके लिए अमेरिका को टैरिफ के दबाव को कम करना होगा और भारत को अपने बाजार पहुंच में कुछ लचीलापन दिखाना होगा।












