India-European Union trade deal after 18 years News in hindi: भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए 27 जनवरी 2026 की तारीख स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गई है। लगभग दो दशकों (18 साल) की लंबी और जटिल बातचीत के बाद, भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने आखिरकार अपने बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर सहमति की मुहर लगा दी है। नई दिल्ली में आयोजित एक विशेष शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा की उपस्थिति में इस ऐतिहासिक साझेदारी का ऐलान किया गया।
18 साल का लंबा सफर और चुनौतियों का अंत
भारत और यूरोपीय संघ के बीच इस व्यापार समझौते की नींव साल 2007 में रखी गई थी। हालांकि, ऑटोमोबाइल, शराब पर आयात शुल्क, डेटा सुरक्षा और श्रम मानकों जैसे कई विवादास्पद मुद्दों के कारण यह बातचीत 2013 में ठप हो गई थी। साल 2022 में बदली हुई वैश्विक परिस्थितियों और चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीति के तहत इन वार्ताओं को दोबारा शुरू किया गया। आज, 18 साल बाद जब इस पर अंतिम सहमति बनी है, तो इसे केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं बल्कि एक मजबूत रणनीतिक साझेदारी के रूप में देखा जा रहा है।

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‘मदर ऑफ ऑल डील’ की मुख्य विशेषताएं
प्रधानमंत्री मोदी ने इस समझौते को ‘साझा समृद्धि का ब्लू प्रिंट‘ बताया है। इस डील के तहत भारत को यूरोपीय संघ के 27 देशों के विशाल बाजार तक सीधी पहुंच मिलेगी, जो दुनिया की कुल जीडीपी का लगभग 25% हिस्सा है।

इस समझौते के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:
- टैरिफ में भारी कटौती: यूरोपीय संघ से भारत आने वाले 90% से अधिक सामानों पर आयात शुल्क (इंपोर्ट ड्यूटी) को या तो पूरी तरह खत्म कर दिया गया है या बहुत कम कर दिया गया है।
- ऑटोमोबाइल और शराब पर राहत: यूरोपीय कारों (जैसे BMW, मर्सिडीज, ऑडी) पर लगने वाले 110% के भारी टैक्स को घटाकर 10% तक लाने की प्रक्रिया शुरू होगी। इसी तरह वाइन और बीयर पर लगने वाले टैक्स में 40-50% तक की कटौती की जाएगी।
- ग्रीन एनर्जी सहायता: जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए यूरोपीय संघ ने भारत को अगले दो वर्षों में 500 मिलियन यूरो (लगभग 4,500 करोड़ रुपये) की वित्तीय सहायता देने की घोषणा की है।
- रोजगार के अवसर: विशेषज्ञों का मानना है कि इस डील से भारत में मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर को गति मिलेगी, जिससे लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होंगे।

आम जनता पर क्या होगा असर?
इस ट्रेड डील का सीधा असर भारतीय उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा। आने वाले समय में यूरोपीय देशों से आने वाली मशीनरी, फार्मास्यूटिकल्स, मेडिकल उपकरण, और लग्जरी सामान सस्ते हो जाएंगे। इसके अलावा ऑलिव ऑयल, डेयरी उत्पादों (सीमित श्रेणी में) और विदेशी शराब की कीमतों में भी गिरावट आएगी। भारतीय निर्यातकों, विशेष रूप से कपड़ा, कृषि उत्पाद और आईटी पेशेवरों के लिए यूरोप के दरवाजे और अधिक खुल जाएंगे, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी होगी।

रणनीतिक और वैश्विक महत्व
मौजूदा समय में जब वैश्विक व्यापार में तनाव बढ़ रहा है, भारत और ईयू का साथ आना एक बड़ा संदेश है। अमेरिकी टैरिफ नीतियों और चीन की विस्तारवादी आर्थिक नीतियों के बीच यह समझौता भारत को एक भरोसेमंद ग्लोबल सप्लाई चेन हब के रूप में स्थापित करता है। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के अनुसार, इस समझौते को इस तरह तैयार किया गया है कि यह दोनों पक्षों के हितों की रक्षा करे और भविष्य के व्यापारिक लक्ष्यों को पूरा करे।

अगला कदम क्या होगा?
हालांकि आज इस समझौते की औपचारिक घोषणा हो गई है, लेकिन इसके कानूनी मसौदे (Legal Scrubbing) पर अभी काम जारी है। उम्मीद जताई जा रही है कि औपचारिक हस्ताक्षरों के बाद इसे 2026 के अंत तक या 2027 की शुरुआत में पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा। कुछ क्षेत्रों में टैरिफ कटौती चरणों में होगी, जिसका पूर्ण लाभ 5 से 10 वर्षों के भीतर दिखने लगेगा।

18 साल की कड़ी मेहनत के बाद हुआ यह समझौता आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को विश्व पटल पर मजबूती प्रदान करता है। यह न केवल भारतीय उद्योगों के लिए लागत कम करेगा, बल्कि भारतीय युवाओं के लिए वैश्विक अवसर भी पैदा करेगा। भारत-ईयू की यह ‘मदर ऑफ ऑल डील’ निस्संदेह 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक घटनाओं में से एक है।













