Mobile ‘no-entry’ in Chardham including Dhari Devi News In Hindi: उत्तराखंड की विश्वप्रसिद्ध चारधाम यात्रा 2026 के शुरू होने से पहले शासन और मंदिर समितियों ने ऐतिहासिक और कड़े फैसले लिए हैं। इस वर्ष की यात्रा न केवल श्रद्धालुओं की संख्या के मामले में रिकॉर्ड तोड़ने वाली मानी जा रही है, बल्कि अनुशासन और धार्मिक मर्यादा के लिहाज से भी यह एक नए युग की शुरुआत होगी। श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) और राज्य सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अब मंदिर परिसर ‘रील’ बनाने या पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि शुद्ध रूप से आध्यात्मिक साधना के स्थल रहेंगे।
मोबाइल फोन पर ‘डिजिटल स्ट्राइक’
गढ़वाल आयुक्त और मंदिर समितियों ने संयुक्त रूप से धारी देवी (सिद्धपीठ), बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के मुख्य मंदिर परिसरों में मोबाइल फोन और कैमरों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।
- सिंह द्वार ही अंतिम सीमा: बद्रीनाथ में सिंह द्वार से 100 मीटर पहले ही मोबाइल जमा कराने होंगे।
- लॉकर की सुविधा: श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए प्रशासन ने मंदिर के बाहर हाई-टेक डिजिटल लॉकर रूम तैयार किए हैं, जहाँ मामूली शुल्क पर फोन जमा किए जा सकेंगे।
- जुर्माना और ज़ब्ती: यदि कोई श्रद्धालु परिसर के भीतर चोरी-छिपे वीडियो बनाते या रील शूट करते पकड़ा गया, तो न केवल उसका फोन ज़ब्त किया जाएगा, बल्कि भारी जुर्माना भी लगाया जाएगा।
गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर ऐतिहासिक रोक
BKTC के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी की अध्यक्षता में हुई हालिया बजट बैठक में एक और बड़ा निर्णय लिया गया है। अब बद्रीनाथ, केदारनाथ समेत समिति के अधिकार क्षेत्र में आने वाले 47 मंदिरों में गैर-हिंदुओं और ‘गैर-सनातनी’ लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है।
- पहचान पत्र अनिवार्य: यात्रा पंजीकरण (Registration) के दौरान आधार कार्ड अनिवार्य कर दिया गया है। प्रवेश द्वारों पर क्यूआर कोड स्कैनिंग के साथ-साथ पहचान की गहन जाँच होगी।
- धार्मिक आस्था का सम्मान: समिति का कहना है कि यह निर्णय किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सनातन परंपराओं और मंदिरों की पवित्रता बनाए रखने के लिए लिया गया है। समिति ने स्पष्ट किया कि जो सनातन धर्म में आस्था रखते हैं और उसकी मर्यादा का पालन करते हैं, वही गर्भगृह और परिसर में प्रवेश के पात्र होंगे।
वन-वे सिस्टम और भीड़ प्रबंधन (Crowd Management)
पिछले वर्षों में उमड़ी भारी भीड़ को देखते हुए, प्रशासन ने केदारनाथ और बद्रीनाथ के संकरे रास्तों पर ‘वन-वे सिस्टम’ (One-Way System) लागू करने का निर्णय लिया है।
- पृथक मार्ग: दर्शन के लिए जाने वाले और वापस लौटने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग रास्ते निर्धारित किए गए हैं ताकि भगदड़ जैसी स्थिति न बने।
- स्लॉट बुकिंग: प्रतिदिन दर्शन करने वाले यात्रियों की संख्या सीमित की गई है। बिना ‘दर्शन स्लॉट’ के किसी भी यात्री को मुख्य पड़ाव से आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
- धारी देवी का सुरक्षा घेरा: श्रीनगर स्थित धारी देवी मंदिर में भी बढ़ते जलस्तर और भीड़ को देखते हुए सुरक्षा घेरा कड़ा किया गया है, जहाँ अब एक बार में केवल निश्चित संख्या में ही भक्त मंदिर के ऊपरी हिस्से में जा सकेंगे।
मुख्यमंत्री का संदेश
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि “देवभूमि की मर्यादा सर्वोपरि है।” सरकार का लक्ष्य यात्रा को सुगम बनाना है, लेकिन धार्मिक परंपराओं से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। उन्होंने यात्रियों से अपील की है कि वे उत्तराखंड आने से पहले नए नियमों की पूरी जानकारी पोर्टल से प्राप्त कर लें।

धारी देवी मंदिर उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में स्थित
एक अत्यंत पूजनीय सिद्धपीठ है। यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक महत्ता बल्कि अपने रहस्यों और चमत्कारों के लिए भी जाना जाता है।
मंदिर कहाँ स्थित है?
यह मंदिर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में स्थित है। यह श्रीनगर (गढ़वाल) से लगभग 15 किलोमीटर और रुद्रप्रयाग से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर, अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है। ऋषिकेश-बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग से होते हुए यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है।
प्रमुख विशेषताएँ और चमत्कार
- रूप बदलना: यहाँ की सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि मंदिर में स्थापित माता की मूर्ति दिन में तीन बार अपना स्वरूप बदलती है। सुबह के समय मूर्ति एक छोटी कन्या, दोपहर में युवती और शाम को एक वृद्ध महिला की तरह दिखाई देती है।
- संरक्षक देवी: धारी देवी को चार धाम (बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री) की रक्षक और उत्तराखंड की संरक्षक देवी माना जाता है।
मंदिर का इतिहास और पौराणिक कथा
- प्राचीन मान्यता: पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार भीषण बाढ़ में कालीमठ का मंदिर बह गया था। देवी की मूर्ति का ऊपरी आधा भाग (सिर) अलकनंदा नदी में बहकर धारी गांव के पास एक चट्टान से टकराकर रुक गया। कहा जाता है कि उस समय मूर्ति से एक दिव्य आवाज आई, जिसने ग्रामीणों को वहीं मूर्ति स्थापित करने का निर्देश दिया। तब से इन्हें ‘धारी देवी’ के नाम से पूजा जाने लगा।
- कालीमठ से संबंध: मान्यता है कि माता के शरीर का ऊपरी हिस्सा यहाँ धारी देवी में है, जबकि शरीर का निचला हिस्सा कालीमठ में स्थित है, जहाँ उन्हें माँ काली के रूप में पूजा जाता है।
- 2013 की त्रासदी से जुड़ा रहस्य: 16 जून 2013 को श्रीनगर जल विद्युत परियोजना के निर्माण के लिए धारी देवी की मूर्ति को उनके मूल स्थान से हटाकर एक ऊंचे प्लेटफॉर्म पर ले जाया गया था। स्थानीय लोगों और पुजारियों का मानना है कि मूर्ति हटाने के कुछ ही घंटों बाद उत्तराखंड में केदारनाथ की भीषण आपदा आई थी, जिसे माता का प्रकोप माना जाता है।
वर्तमान में, अलकनंदा नदी पर बनी झील के बीचों-बीच माता का एक नया भव्य मंदिर बनाया गया है, जहाँ श्रद्धालु दर्शन के लिए जाते हैं।













