राम नगरी अयोध्या में एक बार फिर उत्सव का माहौल है। कर्नाटक के एक विशेष उपहार के रूप में, भगवान राम की एक अत्यंत भव्य और स्वर्ण मंडित प्रतिमा अयोध्या पहुँच चुकी है। यह प्रतिमा न केवल सोने से निर्मित है, बल्कि इसमें हीरे, पन्ने और अन्य बहुमूल्य रत्नों का अद्भुत समावेश है।
प्रतिमा की विशेषताएँ और भव्यता
कर्नाटक शैली में बनी यह प्रतिमा 5 क्विंटल (लगभग 500 किलोग्राम) वजनी है। इसकी ऊँचाई 10 फीट और चौड़ाई 8 फीट है। इस दिव्य विग्रह को ‘तंजौर शैली’ (Tanjore Style) में तैयार किया गया है, जो दक्षिण भारतीय कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
- धातु और रत्न: इस प्रतिमा के निर्माण में सोने, चांदी, हीरे, पन्ना, नीलम और मूंगे का प्रयोग किया गया है। इसकी अनुमानित कीमत 25 से 30 करोड़ रुपये बताई जा रही है।
- कलाकार: बेंगलुरु की प्रसिद्ध मूर्तिकार जयश्री फणीश ने इसे तैयार किया है। इस भव्य कृति को पूर्ण करने में लगभग 2832 घंटों का कठोर परिश्रम लगा है।
- स्वरूप: यह प्रतिमा प्रभु श्री राम के उसी बाल स्वरूप को दर्शाती है जो भक्तों के हृदय में बसता है। इसे एक शीशम की लकड़ी के फ्रेम में सुरक्षित रखा गया है।

स्थापना का स्थान और समय
ताजा समाचारों के अनुसार, इस प्रतिमा को राम मंदिर परिसर में ही अंगद टीला के समीप स्थित संत तुलसीदास मंदिर के पास स्थापित किया जाएगा। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य डॉ. अनिल मिश्रा ने बताया कि इस प्रतिमा को स्थापित करने का मुख्य उद्देश्य राम मंदिर को एक विश्व स्तरीय आध्यात्मिक केंद्र के रूप में और अधिक समृद्ध बनाना है।
27 दिसंबर से 31 दिसंबर 2025 तक होने वाले विशेष अनुष्ठानों के बाद, 29 दिसंबर 2025 को एक शुभ मुहूर्त में इस प्रतिमा का अनावरण किया जा सकता है।
कर्नाटक से अयोध्या तक का सफर
यह प्रतिमा कर्नाटक के उडुपी के पेजावर मठ के स्वामी विश्व प्रसन्ना तीर्थ द्वारा भिजवाई गई है। इसे कर्नाटक से अयोध्या तक लगभग 1750 किलोमीटर का सफर तय कर एक विशेष वैन के जरिए लाया गया। रास्ते भर भक्तों ने इस दिव्य रथ का स्वागत किया और जय श्री राम के उद्घोष से वातावरण गुंजायमान रहा।
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आकर्षण का केंद्र
राम मंदिर के गर्भगृह में पहले से ही अरुण योगीराज द्वारा निर्मित श्याम शिला की प्रतिमा विराजमान है। नई स्वर्ण प्रतिमा के आने से भक्तों के पास दर्शन के लिए एक और दिव्य आकर्षण होगा। मंदिर ट्रस्ट के अनुसार, यह प्रतिमा उन भक्तों की आस्था का प्रतीक है जिन्होंने सदियों से राम मंदिर का सपना देखा था।

भक्तों के लिए दर्शन की व्यवस्था
ट्रस्ट ने यह स्पष्ट किया है कि वर्तमान में राम दरबार और अन्य नवनिर्मित क्षेत्रों के दर्शन के लिए पास की व्यवस्था की जा रही है। चूँकि परिसर में अभी भी कुछ निर्माण कार्य जारी हैं, इसलिए भीड़ को नियंत्रित करने के लिए सुगम दर्शन पास जारी किए जाएंगे, जो निःशुल्क होंगे।
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अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भारतीय इतिहास
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भारतीय इतिहास की एक युगांतकारी घटना है, जो सदियों के संघर्ष, कानूनी लड़ाई और करोड़ों लोगों की अटूट आस्था का परिणाम है। इस भव्य मंदिर के बनने की पूरी कहानी को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संघर्ष राम मंदिर का मुद्दा 500 वर्षों से अधिक पुराना है। 16वीं शताब्दी में मुगल काल के दौरान मंदिर को तोड़कर वहां बाबरी मस्जिद का ढांचा खड़ा किया गया था। 19वीं सदी के अंत से ही इस स्थान को लेकर विवाद गहराया और 1990 के दशक में ‘राम जन्मभूमि आंदोलन’ ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला दशकों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद, 9 नवंबर 2019 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने विवादित भूमि को राम लला का माना और वहां मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया। साथ ही, मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए अलग स्थान देने का निर्देश दिया।
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निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा
- भूमि पूजन: 5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंदिर की नींव रखी।
- वास्तुकला: यह मंदिर पारंपरिक ‘नागर शैली’ में बना है, जिसमें लोहे का प्रयोग नहीं किया गया है।
- प्राण प्रतिष्ठा: 22 जनवरी 2024 को प्रधानमंत्री मोदी और संतों की उपस्थिति में राम लला की नई प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा हुई।
महत्व आज यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बन चुका है। यह विश्व के सबसे बड़े हिंदू मंदिरों में से एक है और अयोध्या को एक वैश्विक पर्यटन और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में स्थापित कर चुका है।













