Raulane, a 5,000-year-old festival of Himachal, learn its history news: किन्नौर, देवभूमि हिमाचल के किन्नौर जिले में एक सदियों पुराना और बेहद अनोखा त्योहार मनाया जाता है, जिसे ‘रौलान’ या ‘रौलाणे’ के नाम से जाना जाता है। इस त्योहार की रहस्यमयी परंपराएं और चेहरे ढककर नृत्य करते कलाकारों की तस्वीरें इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई हैं। यह उत्सव सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि किन्नौर की 5000 साल पुरानी मान्यताओं, परियों की कहानियों और प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा का प्रतीक है।
शीतकालीन परियों को विदाई
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, हिमालय के ऊंचे पहाड़ों में ‘सौणी’ नामक दिव्य परियाँ या आत्माएं निवास करती हैं। ऐसा माना जाता है कि सर्दियों के कठिन समय में, जब बर्फबारी अपने चरम पर होती है,
ये सौणी परियाँ नीचे उतरकर गाँवों की रक्षा करती हैं और ग्रामीणों की संरक्षक बनती हैं। जब वसंत का मौसम आता है और बर्फ पिघलने लगती है, तो इन परियों के अपने रहस्यमयी लोकों में वापस लौटने का समय हो जाता है।
रौलाणे उत्सव इन्हीं सौणी परियों को धन्यवाद देने और उन्हें सम्मानपूर्वक विदा करने का एक भावपूर्ण अवसर है। यह त्योहार इंसानों और अदृश्य, दिव्य शक्तियों के बीच के अटूट रिश्ते को दर्शाता है।
पुरुषों का दूल्हा-दुल्हन बनना
इस उत्सव का सबसे आकर्षक और रहस्यमय हिस्सा ‘रौल’ और ‘रौलाण’ (दुल्हन) की रस्म है। इस रस्म के लिए गाँव के दो पुरुषों को चुना जाता है।
रौल (दूल्हा): दूल्हा बने पुरुष का चेहरा लाल कपड़े से ढका होता है।
रौलाण (दुल्हन): दुल्हन बना पुरुष पारंपरिक किन्नौरी ऊनी पोशाक, विस्तृत गहने, हार और सिर पर खास मुकुट पहनता है।
दोनों ही पुरुषों के चेहरे मुखौटों या कपड़ों से ढके होते हैं और हाथों में दस्ताने होते हैं। चेहरे ढकने के पीछे की मान्यता है कि परियाँ यदि उन्हें देख लेंगी तो वे उन्हें अपने साथ ले जाएंगी, इसलिए अपनी पहचान गुप्त रखना आवश्यक होता है। ये दोनों पात्र त्योहार के दौरान गाँव में घूमते हैं, जोर-जोर से हंसते हैं, गाते हैं और विवाह जैसी प्रतीकात्मक रस्में निभाते हैं। यह पूरी परंपरा लोक-नाट्य और पवित्र अनुष्ठान का अद्भुत संगम होती है।
नागिन नारायण मंदिर में अंतिम अनुष्ठान
त्योहार का मुख्य अनुष्ठान नागिन नारायण मंदिर में होता है। रौल और रौलाण पारंपरिक वेशभूषा में मंदिर में प्रवेश करते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं, और फिर एक धीमा और प्रतीकात्मक नृत्य करते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि यह नृत्य इंसानों और सौणी परियों के बीच संवाद का माध्यम है।
त्योहार के अंत में, गाँव के बुजुर्ग अंतिम रस्में पूरी करते हैं, रौल और रौलाण को आशीर्वाद दिया जाता है, और पूरा समुदाय आने वाले साल के लिए परियों से सुरक्षा और सुख-समृद्धि का वरदान मांगता है। यह विदाई एक तरह का वादा होती है कि अगले सीजन में ये परियाँ फिर से उनके गाँव लौटेंगी।
रौलाणे उत्सव किन्नौर की सदियों पुरानी संस्कृति, लोककथाओं और आध्यात्मिकता का एक अनूठा उदाहरण है।
(For more news apart from Raulane, a 5,000-year-old festival of Himachal, learn its history news in hindi, stay tuned to Mdano News In Hindi)













